भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 331

चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३०७ पाँच प्रकार के गोपुर—द्वारशोभा, द्वारशाला, द्वारप्रासाद, द्वारहर्म्य एवं गोपुर— ये पाँच द्वारों के क्रमशः नाम कहे गये हैं। प्रथम द्वार की संज्ञा 'द्वारशोभा' कही गई है।।११।। अथवा हस्तमानेन विस्तारं परिगृह्यताम्। त्रिपञ्चसप्तनन्दैकादशारत्नैर्विवर्धनात् ।।१२।। पञ्चमानं द्विरलिभ्यां पञ्चस्वेकस्य सम्मतम्। पञ्चसप्तत्रिरूप्येकादशत्रयोदशमानतः ।।१३।। प्रथमावरणे द्वारशोभाव्यासस्तु पञ्चधा। त्रिपञ्चाद्यात्रयोविंशद् द्वारशालाविशालता ।।१४।। पञ्चपञ्चकराद् यावत् त्रयस्त्रिंशत्करान्तकम्। द्वारप्रासादविस्तारं पञ्चधा परिकीर्तितम् ।।१५।। पञ्चत्रिंशत्कराद् यावत् त्रिचत्वारिंशदन्तकम्। द्वारहर्म्यस्य विस्तारं पञ्चभेदमथोच्यते ।।१६।। नवपञ्चकराद् यावत् त्रिपञ्चाशत्करान्तकम्। पञ्चधा विपुलं प्रोक्तं गोपुरस्य मुनीश्वरैः ।।१७।। इनके विस्तार का मान हस्तप्रमाण से ग्रहण करना चाहिये। इसके सम्भावित विस्तार-मान पाँच हैं। द्वार का विस्तार तीन, पाँच, सात, नौ या ग्यारह हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाते हुये ( प्रथम द्वार से अन्तिम द्वार तक ) ले जाना चाहिये। इस प्रकार द्वारशोभा संज्ञक प्रथम द्वार का मान पाँच, सात, नौ, ग्यारह या तेरह हाथ होने पर 'द्वारशाला' संज्ञक द्वार का मान पन्द्रह से लेकर तेईस हाथ-पर्यन्त होता है। 'द्वार- प्रासाद' संज्ञक द्वार का मान पाँच प्रकार का होता है, जो पच्चीस हाथ से प्रारम्भ कर तैंतीस हाथ तक जाता है। 'द्वारहर्म्य' संज्ञक द्वार का मान पैंतीस हाथ से प्रारम्भ कर तैंतालीस हाथ-पर्यन्त पाँच प्रकार का होता है। अन्तिम 'गोपुर' संज्ञक द्वार का मान पैंतालीस हाथ से प्रारम्भ कर तिरेपन हाथ-पर्यन्त पाँच प्रकार का होता है।।१२-१७।। चक्रवर्तिमहाराजवेश्मन्येवमूह्यताम् । सार्धं त्रिपादं द्विगुणं त्र्यंशैकद्व्यंशमायतम् ।।१८।। शोभादीनां तु पञ्चानां द्वाराणामुदितं ततः। तेषामेवं क्रमाद् व्यासादुत्सेधं पृथगुच्यते ।।१९।। उक्त प्रकार से ही चक्रवर्ती एवं महाराज राजाओं के भवनों में भी द्वार का निर्माण