मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ मयमतम् बराबर, पाँच भाग करने पर चौथे भाग के बराबर, छः भाग करने पर पाँचवें भाग के बराबर, सात भाग करने पर छठवें भाग के बराबर एवं आठ भाग करने पर सातवें भाग के बराबर विस्तार रखना चाहिये।।४।। त्रिभागैकांशमध्यं च द्विभागं स्यात्त्रिभागिके ॥५॥ चतुर्भागे त्रिभागं तु पञ्चांशे चतुरंशकम्। द्वारशोभादिविस्तारं गोपुरान्तं क्रमेण तु ॥६॥ उत्तमानामिदं प्रोक्तं हस्तैरप्यथ वक्ष्यते। द्वारशोभा से लेकर गोपुरपर्यन्त विस्तार उत्तम ( बड़े ) प्रासादों में विस्तारमान इस प्रकार क्रमशः रक्खा जाता है। ( प्रधान प्रासाद के विस्तार के ) तीन भाग में से एक भाग, डेढ़ भाग, दो भाग, चार भाग में तीन भाग या पाँच में से चार भाग के बराबर रखना चाहिये। अब विस्तार को हस्त-माप में वर्णित किया जा रहा है।।५-६।। द्विहस्तादि द्विरष्टान्तमेकारलिविवर्धनात् ॥७॥ एकैकं त्रिविधा मानं द्वारशोभादिपञ्चसु। त्रिहस्तादेकत्रिंशान्तं द्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥८॥ प्रोक्तं त्रिः पञ्चधा मानं द्वारशोभादिपञ्चके। नवहस्तं समारभ्य द्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥९॥ सप्तत्रिंशत्करं यावत् पञ्चपङ्क्तिप्रमाणकम्। शोभादिगोपुराणां च विस्तारं परिकीर्तितम् ॥१०॥ ( यदि प्रमुख देवालय छोटा हो तो ) द्वारशोभा आदि द्वारों का प्रमाण दो हाथ- माप से प्रारम्भ कर उसे एक-एक हाथ बढ़ाते हुये सोलह हाथ तक रखना चाहिये। ( मध्यम आकार के देवालय में ) द्वारशोभा आदि पाँच द्वारों में से एक-एक के तीन प्रकार के मान होते हैं। प्रथम द्वार द्वारशोभा से तीन हाथ मान से प्रारम्भ करते हुये दो-दो हाथ बढ़ाते हुये इकतीस हाथ तक ले जाना चाहिये। ( प्रमुख देवालय के उत्तम आकार के होने पर ) नौ हाथ से प्रारम्भ करते हुये सैंतीस हाथ तक दो-दो हाथ बढ़ाते हुये कुल पन्द्रह प्रकार के प्रमाण प्राप्त होते हैं। ये विस्तार-प्रमाण पाँचों द्वारों में द्वार- शोभा से प्रारम्भ होकर गोपुर-पर्यन्त रक्खे जाते हैं।।७-१०।। ☸ पञ्चविधगोपुरम् ☸ द्वारशोभा द्वारशाला द्वारप्रासादहर्म्यके। गोपुरेण तु पञ्चैते द्वारशोभादिपञ्चसु ॥११॥