मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्विंशोऽध्यायः ( गोपुरविधानम् ) अधुना गोपुराणां तु लक्षणं वक्ष्यते क्रमात् । क्षुद्रल्पमध्यमुख्यानां हर्म्याणां स्वप्रमाणतः ॥१॥ गोपुर—अब मैं ( मय ऋषि ) बहुत छोटे-छोटे, मध्यम एवं उत्तम आकार के प्रमुख भवनों के अनुसार गोपुरों के लक्षण का वर्णन करता हूँ ।।१।। ✺ पञ्चविधगोपुरमानम् ✺ मूलप्रासादविस्तारे सप्ताष्टनवभागिके । दशैकादशभागे तु तत्तदेकांशहीनकम् ॥२॥ द्वारशोभादिविस्तारं गोपुरान्तं यथाक्रमम् । क्षुद्रल्पयोः समुद्दिष्टं मध्यानां प्रविधीयते ॥३॥ पाँच प्रकार के गोपुरों का प्रमाण—द्वार-शोभा से प्रारम्भ करते हुये गोपुर तक द्वार का विस्तार इस क्रम से रखना चाहिये। प्रथम द्वार 'द्वारशोभा' का विस्तार प्रधान प्रासाद के विस्तार के सात भाग करने पर उससे एक भाग कम अर्थात् छठवें भाग के बराबर रखना चाहिये। ( दूसरे द्वार ) का विस्तार मूल प्रासाद के आठ भाग करने पर उससे एक भाग कम ( सात भाग ), ( तीसरे द्वार ) का विस्तार मूल भवन के विस्तार के नौ भाग करने पर उससे एक भाग कम ( आठ भाग ), ( चौथे द्वार ) का विस्तार मूल प्रासाद के दस भाग करने पर उससे एक भाग कम ( नौ भाग ) तथा ( पाँचवें द्वार—गोपुर ) का विस्तार मूल प्रासाद के ग्यारह भाग करने पर उससे एक भाग कम ( दस भाग ) रखना चाहिये। ये प्रमाण क्षुद्र एवं अल्प प्रासादों के गोपुरों के होते हैं। मध्यम प्रासादों के गोपुरों का मान इस प्रकार विहित है—।।२-३।। मूलधाम्नस्तु विस्तारे चतुष्पञ्चषडंशके । सप्ताष्टांशे च भागोनं गोपुरान्तं यथाक्रमम् ॥४॥ द्वारशोभादिविस्तारं पञ्चधा परिकीर्तितम् । ( मध्यम आकार के देवालयों में ) द्वारशोभा से गोपुर तक पाँच द्वारों के क्रमशः मान इस प्रकार हैं—मूल प्रासाद की चौड़ाई के चार भाग करने पर तीसरे भाग के मय०-२०