भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 395 में से

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चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३२१ उसकी चौड़ाई से डेढ़ गुनी अधिक होती है। इसकी चौड़ाई को नौ, दस या ग्यारह भागों में बाँटना चाहिये। इसमें तीन, चार या पाच तल का निर्माण करना चाहिये। द्वार के ऊपर भीतरी भाग में रङ्ग एवं परिभद्र निर्मित करना चाहिये। इसका शिरोभाग शाला ( कोष्ठक ) के आकार का हो एवं सामने तथा पीछे महानासी का निर्माण होना चाहिये। इसे अर्धकोटि से युक्त एवं चार पञ्जरों से सुशोभित होना चाहिये। ✺ श्रीकेश-द्वारप्रासादः ✺ श्रीकेशस्य तु संस्थानं तारत्रिभागमायतम् ॥१०६॥ पूर्ववद् भूमिभागं च द्वारे निर्गमकुट्टिमम् । सान्धारं कूटकोष्ठादिसर्वावयवसंयुतम् ॥१०७॥ श्रीकेश रीति से द्वारप्रासाद—श्रीकेश द्वारप्रासाद में लम्बाई चौड़ाई से तीन गुनी अधिक होती है। इसके तल पहले के सदृश होने चाहिये एवं द्वार पर निर्गम कुट्टिम ( थोड़ा बाहर निकला हुआ अधिष्ठान ) निर्मित होना चाहिये। इसे अन्धार ( मध्य में स्थित मार्ग ) से युक्त एवं कूट-कोष्ठ आदि सभी अवयवों से युक्त होना चाहिये॥१०६-१०७॥ नानामसूरकस्तम्भवेदिकाद्यैरलंकृतम् । अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं मध्ये वारणशोभितम् ॥१०८॥ मुखेऽमुखे महानासी शालाकारशिरःक्रियम्। पार्श्वयोर्वेदनास्यः स्युः सर्वावयवशोभितम् ॥१०९॥ स्वस्तिकाकृतिवन्नासी सर्वत्र परिशोभिता। नन्द्यावर्तगवाक्षादिजालकाद्यैर्विचित्रितम् ॥११०॥ इसे विभिन्न प्रकार के अधिष्ठानों, स्तम्भों एवं वेदिका आदि से सुसज्जित करना चाहिये। इसके भीतरी भाग में स्तम्भ एवं उत्तर तथा मध्य भाग में वारण का निर्माण करना चाहिये। इसका शिरोभाग शाला के आकार का हो एवं सामने तथा पीछे महानासी होनी चाहिये। दोनों पाश्वों में चार नासियाँ निर्मित होनी चाहिये एवं इसे सभी अंगों से युक्त होना चाहिये। सभी स्थानों पर स्वस्तिक के आकृति वाली नासियाँ सुशोभित होनी चाहिये तथा इसे नन्द्यावर्त गवाक्ष एवं जालक ( झरोखा ) आदि से सुसज्जित करना चाहिये॥१०८-११०॥ ✺ केशविशाल-द्वारप्रासादः ✺ केशविशालसंस्थानं विस्ताराध्यर्धमायतम्। पूर्ववद् भूमिभागं च मध्यवारणशोभितम् ॥१११॥ मय०-२१

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