भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३२२ मयमतम् कूटकोष्ठाद्यलङ्कारं पूर्ववत् परिकल्पयेत्। मुखे पृष्ठे द्विपाश्र्वे तु महानासीचतुष्टयम् ॥११२॥ सभाकारशिरस्तस्य मुखे पृष्ठे द्विपाश्र्वयोः। अयुग्मस्तूपिकायुक्तं द्वारप्रासादकत्रयम् ॥११३॥ केशवविशालसंज्ञक द्वारप्रासाद गोपुर--केशविशाल द्वारप्रासाद की लम्बाई चौड़ाई की डेढ़ गुनी अधिक होती है तलों का निर्माण पहले के समान होना चाहिये एवं मध्य भाग में वारण ( दालान, ओसारा ) होना चाहिये। कूट, कोष्ठ आदि अलंकरणों का निर्माण पहले की भाँति होना चाहिये। सामने, पीछे एवं दोनों पार्श्वों में चार महानासी निर्मित करनी चाहिये। इसका शिरोभाग सभा के आकार का हो। उसके मुखभाग, पृष्ठभाग एवं दोनों पार्श्वों में विषम संख्या में स्तूपिकायें होनी चाहिये। इस प्रकार द्वारप्रासाद गोपुर के तीन भेद होते हैं।।१११-११३।। ✵ स्वस्तिक - द्वारहर्म्यम् ✵ स्वस्तिकस्य तु संस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् । पङ्क्तिरुद्रार्कभागैस्तु वेदपञ्चर्तुभूमयः ॥११४॥ अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं भूमिभागं च पूर्ववत् । कूटकोष्ठादिसर्वाङ्गैैरन्थाराद्यैरलङ्कृतम् ॥११५॥ सभाशिखरसंयुक्तं स्वस्तिकाकृतिनासियुक् । अष्टनासि सभाग्रे तु अयुग्मस्तूपिकान्वितम् ॥११६॥ द्वारहर्म्य गोपुर का स्वस्तिकसंज्ञक भेद—स्वस्तिकसंज्ञक द्वारहर्म्य गोपुर की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होती है एवं चौड़ाई को दस, ग्यारह या बारह भागों में बाँटना चाहिये। इसे चार, पाँच या छः तल से युक्त निर्मित करना चाहिये। भीतरी भाग में स्तम्भ एवं उत्तर होना चाहिये तथा तलों की योजना पूर्व-वर्णित होनी चाहिये। कूट, कोष्ठ आदि सभी अवयवों तथा अन्थार आदि से इसे सुसज्जित करना चाहिये। इस गोपुर को सभाकार शिखर से युक्त तथा स्वस्तिकाकार नासियों से युक्त करना चाहिये। सभा के अग्र-भाग में आठ नासियाँ एवं विषम संख्या में स्तूपिकाओं का निर्माण करना चाहिये।।११४-११६।। ✵ दिशास्वस्तिक - द्वारहर्म्यम् ✵ दिशास्वस्तिकसंस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् । पूर्ववद् भूमिभागं च कूटकोष्ठाद्यलंकृतम् ॥११७॥ अन्थार्यन्थरहाराङ्गं खण्डहर्म्याभिमण्डितम् । मुखेऽमुखेऽतिभद्रांशं शिरश्चायतमण्डलम् ॥११८॥