भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३२३ महानासि चतुर्युक्तं चतुष्पञ्जरशोभितम्। अन्तः पादोत्तरैर्युक्तं सर्वावयवसंयुक्तम् ॥११९१॥ अनुक्तं पूर्ववत् सर्वमयुग्मस्तूपिकान्वितम् । दिशास्वस्तिक संज्ञक द्वारहर्म्य—दिशास्वस्तिक संज्ञक द्वारहर्म्य गोपुर की लम्बाई विस्तार की दुगुनी होनी चाहिये। इसके तलों की योजना तथा कूट-कोष्ठादि सज्जा पहले के सदृश होनी चाहिये। इसे अन्धारी ( भीतरी भित्ति ), अन्धार, हाराङ्ग एवं खण्डहर्म्य से युक्त करना चाहिये। इसका शिरोभाग आयतमण्डलाकार ( गोलाई लिये लम्बाई ) एवं सामने तथा पीछे अतिभद्रांश निर्मित करना चाहिये। इसे चार महानासियों एवं चार पञ्जरों से अलंकृत करना चाहिये। भीतरी भाग को स्तम्भ, उत्तर एवं सभी अंगों से युक्त करना चाहिये। जिनका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है, उन सबको पहले के समान निर्मित करना चाहिये तथा विषम संख्या में स्तूपिकायें निर्मित होनी चाहिये॥१११७-११९१॥ ✺ मर्दल-द्वारहर्म्यम् ✺ मर्दलस्य तु संस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ॥१२०॥ पूर्ववद् भूमिभागं च कूटकोष्ठाद्यलंकृतम् । पुरे पृष्ठे सभागं स्याद् विस्तारत्र्यंशनिर्गमम् ॥१२१॥ शालाकारशिरोयुक्तं क्षुद्रनासीविभूषितम् । मुखे पृष्ठे महानासी चतुष्पञ्जरशोभितम् ॥१२२॥ अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं द्वारहर्म्यं त्रिधोदितम् । मर्दल संज्ञक द्वारहर्म्य गोपुर—मर्दल की लम्बाई उसकी चौड़ाई की दुगुनी होती है। तलों का निर्माण एवं कूट तथा कोष्ठ आदि अलंकरणों का निर्माण पूर्ववर्णित विधि से होता है। सामने एवं पीछे सभा के अग्र भाग के सदृश निर्माण होना चाहिये तथा इसका निर्गत विस्तार के तीसरे भाग के बराबर होना चाहिये। इसका शीर्षभाग शाला के आकार का हो एवं क्षुद्रनासियों से सुसज्जित हो। मुखभाग एवं पृष्ठभाग की महानासी एवं चार पञ्जरों से सज्जा होनी चाहिये। भीतर स्तम्भ एवं उत्तर निर्मित होना चाहिये। इस प्रकार द्वारहर्म्य तीन प्रकार से वर्णित है॥१२०-१२२॥ ✺ मात्राकाण्ड-द्वारगोपुरम् ✺ मात्राकाण्डस्य संस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ॥१२३॥ रुद्रार्क त्रयोदशांशैः पञ्चषट्सप्तभूमयः । पूर्ववद्भूमिभागं च कूटकोष्ठादि पूर्ववत् ॥१२४॥