भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३२४ मयमतम् अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं चतुर्दिग्गतभद्रकम्। गृहपिण्ड्यलिन्द्रहाराभिर्मण्डितं खण्डहर्म्यवत् ॥१२५॥ शालाकारशिरः कुर्यान्महानासी मुखेऽमुखे । पार्श्वयोः क्षुद्रनास्यश्च यथायुक्त्या प्रयोजयेत् ॥१२६॥ द्वारगोपुर का मात्राकाण्ड संज्ञक भेद—मात्राकाण्ड की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होती है। इसकी चौड़ाई के ग्यारह, बारह या तेरह भाग करने चाहिये एवं पाँच, छः या सात तल होने चाहिये। तलयोजना पूर्ववत् एवं कूट तथा कोष्ठ आदि भी पहले के सदृश होने चाहिये। इसके भीतरी भाग में स्तम्भ एवं उत्तर हों तथा चारो दिशाओं में भद्रक निर्मित हों। इसे गृहपिण्डी ( भीतरी भित्ति ), अलिन्द एवं हारा से अलंकृत करना चाहिये तथा खण्डहर्म्य निर्मित होना चाहिये। इसका शिरोभाग शाला की आकृति का हो तथा सामने एवं पीछे महानासी निर्मित हो। दोनों पाश्र्वों में क्षुद्रनासियाँ यथोचित रीति से निर्मित होनी चाहिये॥१२३-१२६॥ ❋ श्रीविशाल-द्वारगोपुरम् ❋ श्रीविशालस्य संस्थानं पञ्चांशे द्व्यंशमायतम्। पूर्ववद् भूमिभागं च मूलतः क्रकरीकृतम् ॥१२७॥ शिरः क्रकरकोष्ठं च सभा वा तत्र शीर्षकम्। नानामसूरकस्तम्भवेदिकाद्यैरलंकृतम् ॥१२८॥ चतुर्दिक्षु महानासी क्षुद्रनासीविभूषिता। स्वस्तिकाकृतिवन्नास्यः सर्वत्र परिकल्पयेत् ॥१२९॥ श्रीविशाल संज्ञक द्वारगोपुर—श्रीविशाल द्वारगोपुर की चौड़ाई के पाँच भाग में से दो भाग के बराबर अधिक लम्बाई रखनी चाहिये। तल-योजना पहले के सदृश होनी चाहिये तथा मूल से ऊपर क्रकरी आकार ( क्रास का आकार ) में निर्मित करना चाहिये। इसके शिरोभाग पर क्रकरकोष्ठ ( क्रास के आकार का कोष्ठ ) या सभा का आकार निर्मित करना चाहिये। इसे विभिन्न प्रकार के अधिष्ठानों, स्तम्भों एवं वेदिकाओं से सुसज्जित करना चाहिये। चारो दिशाओं में महानासी एवं क्षुद्रनासी निर्मित करना चाहिये। स्वस्तिकाकार नासियाँ सभी ओर निर्मित होनी चाहिये॥१२७-१२९॥ ❋ चतुर्मुख-द्वारगोपुरम् ❋ चतुर्मुखस्य संस्थानं चतुर्भागाधिकायतम् । पूर्ववद् भूमिभागं च दिशाभद्रकसंयुतम् ॥१३०॥ हारामध्ये तु कर्तव्यं कुड्यकुम्भलतान्वितम् । तोरणैर्जालकैर्वृत्तस्फुटिताद्यैरलंकृतम् ॥१३१॥