मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३२५ कूटैर्नीडैस्तथा कोष्ठैः क्षुद्रकोष्ठैर्विभूषितम्। गृहपिण्ड्यलिन्द्रहाराभिर्मण्डितं खण्डहर्म्यवत् ।।१३२।। चतुर्मुख संज्ञक द्वारगोपुर—चतुर्मुख द्वारगोपुर की लम्बाई उसकी चौड़ाई से चार भाग अधिक होती है। इसके तलों का भाग पूर्व-वर्णित हो एवं प्रत्येक दिशा में भद्रक हो। हारा के मध्य में कुम्भलता से युक्त भित्ति हो एवं तोरण, जालक तथा वृत्तस्फुटित (अलङ्करणविशेष) आदि से सुसज्जित हो। कूटों, नीडों (सजावटी खिड़कियों), कोष्ठों एवं क्षुद्रकोष्ठों से अलंकृत हो एवं गृहपिण्डी, अलिन्द्र, हारा एवं खण्डहर्म्य आदि से सुसज्जित हो।।१३०-१३२।। सभाशिरस्तु वा शालाकारं वा शीर्षकं तु तत् । चतुर्नासिसमायुक्तं पार्श्वे द्वे द्वे तु नासिके ।।१३३।। उपर्युपरिकूटाद्यैः सर्वाङ्गैः समलङ्कृतम् । अन्तःसोपानसंयुक्तं द्वारगोपुरकं त्रिधा ।।१३४।। इसका शिरो-भाग सभा की आकृति का या शाला की आकृति का होता है। यह चार नासियों से युक्त होता है एवं पार्श्वों में दो-दो नासिकायें होती हैं। ऊपरी (तल) कूट आदि सभी अंगों से सुसज्जित होता है तथा भीतर सोपान से युक्त होता है। इस प्रकार यह गोपुर तीन प्रकार का होता है।।१३३-१३४।। वर्षस्थलसमोपेतं निवारितलकं तु वा। घनाघनाङ्गयुक्तानि श्रीकरादीनि युक्तितः ।।१३५।। श्रीकर आदि गोपुर वर्षा के स्थल (वर्षा के जल के निकास-स्थल) से युक्त अथवा इससे रहित हो सकते हैं एवं ये सघन अथवा घनरहित अंगों से युक्त आवश्यकतानुसार निर्मित किये जाते हैं।।१३५।। नानाविधस्तम्भमसूरकाणि नानाविधाङ्गानि सलक्षणानि । नानोपपीठानि समण्डकानि भद्राण्यभद्राणि घनाघनानि ।।१३६।। एकादिसप्तान्ततलानि युक्त्या शोभादिपञ्चादशगोपुराणि । शालासभामण्डपशीर्षकाणि प्रोक्तानि सद्भान्यमरेश्वराणाम् ।।१३७।। इति मयमते वास्तुशास्त्रे गोपुरविधानं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ❦ ❧ शोभा आदि पन्द्रह गोपुरों में अनेक प्रकार के स्तम्भ, मसूरक (अधिष्ठान), अनेक प्रकार के लक्षणों से युक्त अवयव, विविध प्रकार के उपपीठ मण्डक सहित,