भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३२६ मयमतम् भद्र से युक्त या भद्ररहित तथा घने या विरल अंग आदि से युक्त एक से लेकर सात तलों तक का निर्माण उचित रीति से करना चाहिये। इनके शीर्षभाग शाला के आकार, सभा के आकार या मण्डप के आकार के निर्मित होने चाहिये। इस प्रकार राजाओं एवं देवों के भवनों के गोपुरों का वर्णन किया गया।।१३६-१३७।। व्याख्यात्मक टिप्पणी गोपुर-भेद (श्लोक ११) पाँच प्रकार के गोपुरों का वर्णन मानसार में इस प्रकार प्राप्त होता है— आद्यके द्वारशोभं तु द्वारशाला द्वितीयके।। द्वारप्रासादो मध्ये द्वारहर्म्यं मयाधिके। महामर्यादादिकुड्ये च महागोपुरमीरितम्।। (३३.४-५) शिल्परत्न में भी इस ग्रन्थ की पुष्टि प्राप्त होती है— द्वारशोभा द्वारशाला द्वारप्रासादहर्म्यके। द्वारगोपुरमित्येके क्रमान्नाम्ना प्रकीर्तिताः।। (पूर्व.-४१.२) गोपुर-तलनिर्माण (श्लोक ३४-३६) गोपुर के तल-निर्माण के प्रसंग में शिल्परत्न का मत इस प्रकार है— एकद्वित्रितलं वा तु द्वारशोभाख्यमाचरेत्। द्वित्रिवेदतलं कुर्यात् द्वारशालाख्यगोपुरम्।। त्रिवेदसायकतलं द्वारप्रासादकं तथा। हर्म्याख्यगोपुरं वेदपञ्चषट्तलमाचरेत्।। द्वारगोपुरकं कुर्यात् पञ्चषट्सप्तभूमिकम्। (पूर्व.-४१.३-५) इन गोपुरों के प्रमाण शिल्परत्न (पूर्व. ४१ अ.) में प्राप्त होते हैं। इन्हें प्रमाण- भेद की दृष्टि से श्रेष्ठ, मध्यम एवं कन्यस कहा गया है— महत्तरे तु श्रेष्ठानि मध्यमे मध्यमत्रयम्। क्षुद्रल्पयोः प्रशस्तं हि कन्यसत्रयगोपुरम्।। (४१.१६) इनके उत्तम, मध्यम एवं अधम भेद तथा इनके उपभेद मानसार (३३.७-११) में प्राप्त होते हैं।