मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० मयमतम् विशालालय प्रकार की द्वारशाला—विशालालय द्वारशाला की लम्बाई उसकी चौड़ाई से चतुर्थांश कम दुगुनी रखनी चाहिये। इसके तल पूर्ववर्णित विधि से निर्मित होने चाहिये तथा इसे कूट एवं कोष्ठ आदि से सुसज्जित होना चाहिये। इसको शीर्ष- भाग पर अर्धकोटि, भद्र तथा आगे एवं पीछे भद्रनासी से युक्त करना चाहिये। दोनों पार्श्वों में चार नासियाँ, शिखर भाग शालायुक्त एवं विषम संख्या में स्थूपिकायें निर्मित होनी चाहिये। शेष अंग पूर्व के सदृश निर्मित होने चाहिये।।९८-९९।। ☀ विप्रतीकान्त-द्वारशाला ☀ विप्रतीकान्तसंस्थानं त्र्यंशे द्व्यंशाधिकायतम् ।।१००।। कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं पूर्ववत् परिकल्पयेत् । पूर्ववद् भूमिभागं च चतुर्दिग्गतभद्रकम् ।।१०१।। चतस्रः शिखरे नास्यः शिरो भद्रसमन्वितम् । अन्तः पादोत्तरैर्युक्तमयुग्मस्थूपिकान्वितम् ।।१०२।। द्वारशालात्रयं प्रोक्तं सर्वाङ्गं परिमण्डितम् । विप्रतीकान्त रीति से द्वारशाला—विप्रतीकान्त द्वारशाला की लम्बाई उसकी चौड़ाई से दो तिहाई अर्थात् तीन भाग में से दो भाग के बराबर अधिक रखनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अंगों को पहले के समान निर्मित करना चाहिये। तलों का निर्माण पूर्ववर्णित विधि से करना चाहिये। चारो दिशाओं में भद्रक, शिखर पर चार नासियाँ एवं शिरो भाग को भद्र से युक्त करना चाहिये। इसके भीतरी भाग में स्तम्भ एवं उत्तर निर्मित करना चाहिये एवं इसे विषम संख्या में स्थूपिकाओं से युक्त करना चाहिये। इस प्रकार सभी अवयवों से युक्त तीन प्रकार की द्वारशालाओं का वर्णन किया गया।।१००-१०२।। ☀ श्रीकान्त-द्वारप्रासादः ☀ श्रीकान्तस्य च संस्थानं विस्ताराध्यर्धमायतम् ।।१०३।। नन्दपङ्क्तिशिवांशैश्च त्रिचतुष्पञ्चभूमयः । अन्तः पादोत्तरैर्युक्तमन्याराद्यैरलंकृतम् ।।१०४।। द्वारस्योर्ध्वेऽन्तरे रङ्गं परिभद्रसमन्वितम् । मुखेऽमुखे महानासी शालाकारशिरो भवेत् ।।१०५।। अर्धकोटिसमायुक्तं चतुष्पञ्जरशोभितम् । द्वारप्रासादसंज्ञक गोपुर का श्रीकान्त प्रकार—श्रीकान्त द्वारप्रासाद की लम्बाई