भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३१९ चौड़ाई से दो तिहाई अधिक होती है। इसके तल पूर्व वर्णित एवं कूट तथा कोष्ठ आदि अंग भी पूर्ववर्णित विधि से निर्मित करने चाहिये। इसे भीतरी स्तम्भों एवं उत्तर से युक्त तथा विविध अंगों से सुसज्जित करना चाहिये। शिखर के आगे एवं पीछे षण्णासी (छः नासियाँ) तथा दोनों पार्श्वों में सभा के आकार का शिरोभाग होना चाहिये, जिस पर विषम संख्या में स्थूपिकायें होनी चाहिये। इस प्रकार द्वारशोभा के तीन भेदों का वर्णन किया गया, जो अपने सभी अंगों से युक्त हैं एवं जिनका मुखभाग अलंकृत है।।९१-९३।। ✵ विजयविशाल-द्वारशाला ✵ विजयविशालसंस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ॥९४॥ सपादं वाऽथ सार्धं वा पादोनद्विगुणायतम् । सप्तनन्दशिवांशैश्च तलं द्वित्रिचतुष्टयम् ॥९५॥ द्वारशालासंज्ञक गोपुर का विजयविशाल प्रकार—विजयविशाल द्वारशाला की लम्बाई उसकी चौड़ाई की