भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३१८ मयमतम् स्वस्तिकाकृतिकं नासो सर्वत्र प्रविधीयते । मुखेऽमुखे महानासी वंशनासी द्विपाश्र्वयोः ॥८७॥ शिरःक्रकरकोष्ठं वा युग्मस्थूपिसमायुतम् । लुपारोहिशिरो वाऽपि मण्डपाकृतिरेव वा ॥८८॥ स्वस्तिक के आकृति की नासा ( सजावटी छोटी खिड़की ) सभी स्थानों पर होनी चाहिये। सामने एवं पीछे महानासी तथा दोनों पार्श्वों में वंशनासी का निर्माण करना चाहिये। शिरोभाग में क्रकर कोष्ठ ( विशिष्ट आकृति ) या सम संख्या में स्थूपी होनी चाहिये। साथ ही इसके शिरोभाग पर लुपा हो अथवा इसकी आकृति मण्डप के सदृश होनी चाहिये॥८७-८८॥ ✺ रतिकान्त-द्वारशोभा ✺ रतिकान्तस्य संस्थानं विस्ताराध्यर्धमायतम् । कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं पूर्ववत् परिकल्पयेत् ॥८९॥ शालाकारशिरस्तस्मिन् षण्णासी मुखपृष्ठयोः । सार्धकोटिसमायुक्तं मध्यवेशनसंयुतम् ॥९०॥ रतिकान्त रीति से द्वारशोभा—रतिकान्त शैली में लम्बाई चौड़ाई से डेढ़ गुनी अधिक होती है। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अंगों को पूर्ववर्णित विधि से करना चाहिये। इसका शिरोभाग शाला के आकार का होना चाहिये एवं षण्णासी ( छोटी- छोटी छः सजावटी खिड़कियाँ ) सामने एवं पीछे होनी चाहिये तथा अर्धकोटि ( विशिष्ट आकृति ) का निर्माण करना चाहिये। स्थूपियों की संख्या सम होनी चाहिये। इसे अन्तःपाद ( भीतरी स्तम्भ ) एवं उत्तर से युक्त तथा मध्यवेशन ( मध्य भाग में कक्ष ) से युक्त निर्मित करना चाहिये॥८९-९०॥ ✺ कान्तविजय-द्वारशोभा ✺ कान्तविजयसंस्थानं तारत्रिद्व्यंशमायतम् ॥९१॥ पूर्ववद् भूमिभागं च कूटकोष्ठादि पूर्ववत् । अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं नानाङ्गैः समलंकृतम् ॥९२॥ शिखरे च मुखे पृष्ठे षण्णास्यः पार्श्वयोर्द्वयोः । सभाकारः शिरस्तस्मिन्नयुग्मस्थूपिकान्वितम् ॥९३॥ द्वारशोभात्रयं प्रोक्तं द्वाराङ्गं मुखशोभितम् । कान्तविजय रीति से द्वारशोभा—कान्तविजय द्वारशोभा की लम्बाई उसकी