भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३१७ सोपान चौकोर उपपीठ से प्रारम्भ करना प्रशस्त होता है। बुद्धिमान (स्थपति) को जिस प्रकार सोपान का निर्माण सुन्दर लगे, उस प्रकार समुचित रीति से करना चाहिये।।८०।। ✺ गोपुरालङ्कारः ✺ गोपुराणामलङ्कारं प्रत्येकं वक्ष्यतेऽधुना । मण्डपाभा यथा द्वारशोभा तत्र प्रकीर्तिता ॥८१॥ दण्डशाला यथा द्वारशाला तत्र विधीयते । प्रासादाकृतिवद् द्वारप्रासादं प्रोच्यते बुधैः ॥८२॥ मालिकाकृतिवद् द्वारहर्म्यं तु प्रोच्यते बुधैः । सशालाकृतिसंस्थानं द्वारगोपुरमिष्यते ॥८३॥ सर्वेषु गोपुरं कुर्याद्यथायुक्ति विशेषतः । गोपुर के अलङ्कार—गोपुरों के प्रत्येक अलङ्कार का वर्णन अब किया जा रहा है। द्वारशोभा गोपुर का निर्माण मण्डप के सदृश करना चाहिये। द्वारशाला गोपुर का निर्माण दण्डशाला के समान करना चाहिये। द्वारप्रासाद गोपुर का निर्माण प्रासाद (मन्दिर) की आकृति के सदृश करना चाहिये। द्वारहर्म्य गोपुर की आकृति मालिका की आकृति के समान होनी चाहिये। द्वारगोपुरसंज्ञक गोपुर का स्वरूप शाला के समान होना चाहिये। सभी गोपुरों का अलङ्करण विशेष रूप से यथोचित रीति से करना चाहिये।।८१-८३।। ✺ श्रीकर-द्वारशोभा ✺ श्रीकरस्याप्यलङ्कारं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥८४॥ विस्तारद्विगुणं वाऽपि पादोनद्विगुणायतम् । पञ्चसप्तनवांशं तु विस्तारे प्रविधीयते ॥८५॥ विस्तारांशप्रमाणेन दैर्घ्यभागांश्च कल्पयेत् । एकद्वित्रितलोपेतं सर्वावयवसंयुतम् ॥८६॥ श्रीकर-रीति से द्वारशोभा—श्रीकर के भी अलङ्कारों का वर्णन क्रमानुसार किया जा रहा है। इसकी लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी या दुगुनी से चौथाई कम होनी चाहिये। विस्तार के पाँच, सात या नौ भाग करने चाहिये। विस्तार के भाग-प्रमाण से लम्बाई के भाग निश्चित करना चाहिये। इसे एक, दो या तीन तल से एवं सभी अंगों से युक्त निर्मित करना चाहिये।।८४-८६।।