भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३१६ मयमतम् अंशेन खण्डहर्म्यं स्यात्कूटकोष्ठादि पूर्ववत्। (षट्‌तल में) चौड़ाई के बारह भाग करने चाहिये। चार भाग से नालीगेह, दो भाग से भित्ति-विष्कम्भ, एक भाग से अन्धारक (मार्गविशेष) एवं एक भाग से खण्डहर्म्य निर्मित करना चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि की संरचना पहले के समान करनी चाहिये।।७३।। तारे त्रयोदशांशे तु गर्भगेहं युगांशकम् ॥७४॥ द्वयंशार्धं भित्तिविष्कम्भमेकभागमलिन्द्रकम् । एकांशं खण्डहर्म्यं स्यात्कूटकोष्ठादि पूर्ववत् ॥७५॥ मुखेऽमुखे महाशाला षड्भागेन विधीयते। पञ्जरैर्हस्तिपृष्ठैश्च पक्षशालादिभिर्युतम् ॥७६॥ नानामसूरकस्तम्भवेदीजालकतोरणम् । एवं सप्ततलं प्रोक्तं गोपुरं सार्वदेशिकम् ॥७७॥ (सात तल के गोपुर में) चौड़ाई के तेरह भाग करने चाहिये। चार भाग से गर्भगृह (नालीगृह, मध्यभाग), ढाई भाग से भित्ति-विष्कम्भ, एक भाग से अलिन्द्र एवं एक भाग से खण्डहर्म्य का निर्माण करना चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि पूर्वविधि से निर्मित करनी चाहिये। सामने एवं पृष्ठभाग में छः भाग से महाशाला निर्मित करना चाहिये। इसे पञ्जर, हस्तिपृष्ठ, पक्षशाला आदि से युक्त करना चाहिये। इसमें विभिन्न प्रकार के मसूरक (अधिष्ठान), स्तम्भ, वेदी एवं जालक-तोरण निर्मित करना चाहिये। इस प्रकार सभी स्थानों के अनुकूल सप्ततल गोपुर का वर्णन किया गया।।७४-७७।। ✵ द्वारविस्तारमानम् ✵ मूलद्वारस्य विस्तारे पञ्चभागैकहीनकम् । चतुर्भागैकहीनं वोपरिष्टाद् द्वारविस्तृतम् ॥७८॥ उपर्युपरि वेशं च मध्यपादोत्तरैर्युतम् । गर्भगारे तु सोपानं ह्युपर्युपरि विन्यसेत् ॥७९॥ द्वार की चौड़ाई का प्रमाण—ऊपरी तल के द्वार की चौड़ाई मूल द्वार (निचले तल, भूतल के द्वार) के विस्तार से पाँच या चार भाग कम होना चाहिये। प्रत्येक तल के मध्य भाग में पाद एवं उत्तर (चौखट) से युक्त द्वार स्थापित होना चाहिये। ऊपरी तलों में सोपान का विन्यास गर्भ-गृह (मध्य भाग) में करना चाहिये। चतुष्कर्णे तु सोपानमुपपीठे प्रशस्यते । यथायुक्ति यथाशोभं तथा योज्यं विचक्षणैः ॥८०॥