भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३१५ हारायां क्षुद्रनीडं तदर्धभागमिति स्मृतम्। शालायामं तु पञ्चांशमायामे प्रविधीयते ॥६७॥ एवं त्रितलमाख्यातं शेषमूह्यं विचक्षणैः । कूट की चौड़ाई एक भाग से, शाला (मध्य कोष्ठ) की चौड़ाई एवं लम्बाई दोनों दो भाग से, हारा (मध्य निर्मिति) दो भाग से एवं क्षुद्रनीड (छोटी सजावटी खिड़कियाँ) आधे भाग से निर्मित करनी चाहिये। शाला की लम्बाई को पाँच भाग से निर्मित करना चाहिये। इस प्रकार त्रितल गोपुर का वर्णन किया गया है। शेष भागों का निर्माण विद्वान् लोगों को अपने विचार के अनुसार करना चाहिये।।६६-६७।। तारे पङ्क्त्यंशके नालीगेहं तत्त्रिभिरंशकैः ॥६८॥ सार्धांशं भित्तिविष्कम्भमेकभागमलिन्द्रकम् । एकांशं खण्डहर्म्यं स्यात्कूटकोष्ठादि पूर्ववत् ॥६९॥ मुखेऽमुखे महाशाला पञ्चांशं च षडंशकम् । सर्वावयवसंयुक्तं चतुर्भौममिदं वरम् ॥७०॥ (चार तलों वाले गोपुर में) चौड़ाई के दस भाग करने चाहिये। तीन भाग से नालीगेह (मध्य भाग), डेढ़ भाग से भित्ति-विष्कम्भ (भीतरी भित्ति की मोटाई) एक भाग से अलिन्द एवं एक भाग से खण्डहर्म्य (बाह्य भित्ति से सम्बद्ध संरचना) निर्मित करनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ का निर्माण पहले के समान करना चाहिये। सामने एवं पीछे के भाग में महाशाला (बड़ा प्रकोष्ठ) पाँच भाग एवं छः भाग से निर्मित करना चाहिये। इस प्रकार सभी अंगों से युक्त चार तल से युक्त श्रेष्ठ गोपुर निर्मित होता है।।६८-७०।। तारे रुद्रांशके नालीगेहं तत्त्रिभिरंशकैः । द्विभागं भित्तिविष्कम्भमेकभागमलिन्द्रकम् ॥७१॥ एकांशं खण्डहर्म्यं स्याच्छेषं पूर्ववदाचरेत् । एवं पञ्चतलं विद्यात् षट्‌तलं चाधुनोच्यते ॥७२॥ (पञ्चतल गोपुर में) विस्तार के ग्यारह भाग करने चाहिये। तीन भाग से नालीगेह, दो भाग से भित्ति-विष्कम्भ, एक भाग से अलिन्द्र, एक भाग से खण्डहर्म्य एवं अन्य अंगों का निर्माण पूर्व-वर्णित विधि से करना चाहिये। इस प्रकार पञ्चतल गोपुर का निर्माण करना चाहिये। अब षट्‌तल गोपुर का वर्णन किया जा रहा है। विपुले द्वादशांशे तु नालीगेहं युगांशकम् । द्विभागं भित्तिविष्कम्भमंशेनान्धारकं भवेत् ॥७३॥