भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

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३१४ मयमतम् करने चाहिये। तीन भाग से नालीगेह ( मध्य का स्थान ) एवं शेष भाग से भित्तिविष्कम्भ ( भित्ति की मोटाई ) निर्मित करनी चाहिये।।५९।। विस्तारे सप्तभागं स्याद्गर्भगेहं युगांशकम् ।।६०।। शेषं तु भित्तिविष्कम्भमेकांशं कूटविस्तृतम्। कोष्ठकं त्र्यंशकं तारे पञ्चांशं स्यात्तदायते ।।६१।। कूटकोष्ठकयोर्मध्ये पञ्जरादिविभूषितम्। एवं द्वितलमुद्दिष्टं त्रितलस्य विधीयते ।।६२।। ( यदि दो तलों का गोपुर हो तो ) चौड़ाई के सात भाग करने चाहिये। चार भाग से गर्भगृह ( मध्य भाग ) एवं शेष भाग से भित्तिविष्कम्भ ( भित्ति की चौड़ाई ) रखनी चाहिये। एक भाग से कूट का विस्तार रखना चाहिये। कोष्ठक का विस्तार तीन भाग से एवं लम्बाई पाँच भाग से निर्मित करनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ के मध्य भाग को पञ्जर आदि से अलंकृत करना चाहिये। इस प्रकार द्वितल गोपुर का वर्णन किया गया है। अब त्रितल गोपुर का वर्णन किया जा रहा है।।६०-६२।। विस्तारे नवभागे तु नालीगेहं त्र्यंशकम्। गृहपिण्ड्यलिन्द्रहारा भागेन परिकल्पयेत् ।।६३।। कूटकोष्ठादिसर्वाङ्गं पूर्ववत् परिकल्पयेत्। शेषं तु भित्तिविष्कम्भमेकांशं कूटविस्तृतम् ।।६४।। ( त्रितल गोपुर में ) चौड़ाई के नौ भाग करने चाहिये। तीन भाग से नालीगेह ( मध्य भाग ), एक भाग से गृहपिण्डी ( अन्तःभित्ति ) एवं एक भाग से अलिन्दहारा ( बाह्य भित्ति ) निर्मित करनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अंगों को पहले के समान निर्मित करना चाहिये। शेष भाग से भित्ति-विष्कम्भ एवं एक भाग से कूट का विस्तार रखना चाहिये।।६३-६४।। शालायामं त्रिभागं स्यादेकांशं लम्बपञ्जरम्। हाराभागमथार्धं स्यादायामे कोष्ठकायतुम् ।।६५।। पञ्चांशं वा षडंशं वाप्यूर्ध्वे सप्तांशविस्तृतम्। शाला ( मध्य कोष्ठ ) की लम्बाई तीन भाग एवं लम्ब-पञ्जर ( मध्य में लटकता हुआ कोष्ठ ) एक भाग, आधे भाग से हाराभाग निर्मित होना चाहिये। कोष्ठ की लम्बाई पाँच या छः भाग होनी चाहिये एवं ऊर्ध्व भाग में चौड़ाई सात भाग होनी चाहिये।।६५।। कूटमंशं द्विभागेन शालायामं द्विभागिकम् ।।६६।।