मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः 卐 भूलम्बविधानम् ९९ भवन का विस्तार स्तम्भ के बाहर से मापना चाहिये एवं इसकी ऊँचाई इसके जन्म ( मूल ) से प्रारम्भ कर स्तूपिका-पर्यन्त लेनी चाहिये। कुछ विद्वान् भवन की ऊँचाई शिखर-पर्यन्त मानते हैं।।२०।। महतामुच्छ्रयो हस्तैरुद्देशः समुदाहृतः। तत्तद्व्यासे तु सप्तांशे निर्देशोच्चं त्र्यंशकैः ॥२१॥ बड़े भवनों की ऊँचाई कर-प्रमाण में दी गई है। इनका विस्तार दश में सातवाँ भाग होना चाहिये।।२१।। विस्तारद्विगुणोत्सेधं युक्त्याल्पेषु प्रयोजयेत्। देवानां सार्वभौमानामाद्वादशतलं विदुः ॥२२॥ छोटे भवनों की ऊँचाई उनके विस्तार की दुगुनी होनी चाहिये। सार्वभौम देवों का मन्दिर बारह तलों का होना चाहिये।।२२।। रक्षोगन्धर्वयक्षाणामेकादशतलं मतम्। विप्राणां नवभौमं स्याद् दशभौममथापि वा ॥२३॥ राक्षस, गन्धर्व एवं यक्षों का भवन एकादश तल का तथा ब्राह्मणों का भवन नौ या दश तल का होना चाहिये।।२३।। युवराजस्य राज्ञश्च पञ्चमस्यैव सप्तभूः। तदाद्येकादशतलं षण्णां वै चक्रवर्तिनाम् ॥२४॥ पाँचवें प्रकार का भवन युवराजों एवं राजाओं का होता है, जो सात तल का होता है। चक्रवर्ती राजाओं का भवन छः तल से प्रारम्भ कर ग्यारह तलपर्यन्त होता है।।२४।। त्रिभूमं च चतुर्भूमं वणिजां शूद्रजन्मनाम्। राज्ञां पञ्चतलं वाऽपि मतं पट्टभृतां तु तत् ॥२५॥ वैश्यों एवं शूद्रों का भवन तीन एवं चार-तल का होना चाहिये तथा पट्टभृत राजाओं ( छोटे राजाओं ) का भवन पाँच तल का होना चाहिये।।२५।। शतहस्तसमुत्सेधात् सप्तत्यारत्निविस्तरात्। नेष्यतेऽधिकमानं तु सर्वथा तद्विचक्षणैः ॥२६॥ कुशल स्थपति एक सौ हाथ से अधिक ऊँचे तथा सत्तर हाथ से अधिक विस्तृत भवन का प्रमाण अभीष्ट नहीं मानते हैं।।२६।। क्षुद्रल्पमध्यमवरादिविमानकानां व्यामिश्रहस्तकयुजां विपुलोच्चभेदम्।