भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 12

( १० ) २०. द्विभूमिविधान—इस अध्याय में द्वितल प्रासाद के पाँच प्रमाण वर्णित हैं। इसके अन्तर्गत स्वस्तिक, विपुलसुन्दर, कूट, कैलासादि भेद, भवनों के भेद, खण्ड ‘भवन तथा तोरण वर्णित हैं। २१. त्रिभूमिविधान—इसके अन्तर्गत त्रितल भवन के पाँच भेद, स्वस्तिक, विमलाकृति, हस्तिपृष्ठ, मुखमण्डप, पुनः हस्तिपृष्ठ, स्तम्भतोरण, पुनः हस्तिपृष्ठ, भद्रकोष्ठ, वृत्तकूट, सुमङ्गल, गान्धार, श्रीभोग, कूटकोष्ठादि, धामभेद, नालीगृह ( गर्भगृह ), वेदिका, तोरणादि-विधान एवं सोपान वर्णित हैं। २२. चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधान—इस अध्याय में चतुर्भौम देवालय के पाँच भेद—सुभद्रक, श्रीविशाल, भद्रकोष्ठ, जयावह तथा भद्रकूट वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त कपोतपञ्जर, पुनः भद्रकूट, मनोहर, आवन्तिक एवं सुखावह का वर्णन है। चार तल के अतिरिक्त पाँच तल, छः से ग्यारह तल, बारह तल, खण्डहर्म्य तथा कूटकोष्ठादि का वर्णन प्राप्त होता है। २३. प्राकार-परिवार-विधान—इसमें प्राकार या चारदिवारी की आवश्यकता, प्राकार का प्रमाण, प्राकार की भित्ति, आवृतमण्डप, भित्ति के शीर्षालंकार, अधिष्ठान की ऊँचाई, परिवारालय-विधान, अष्ट परिवार, द्वादश परिवार, षोडश परिवार, बत्तीस परिवार, मालिकापंक्ति, पीठलक्षण, ध्वजस्थान, प्राकाराश्रित स्थान, शक्तिस्तम्भ, अन्य स्थान, विष्णु परिवार तथा वृषलक्षण वर्णित हैं। २४. गोपुर-विधान—इस अध्याय में अत्यन्त छोटे-छोटे, मध्यम तथा उत्तम प्रकार के भवनों या देवालयों को दृष्टि में रखकर गोपुर-निर्माण पर प्रकाश डाला गया है। प्रधान रूप से गोपुर के पाँच भेद प्राप्त होते हैं, जो द्वारशोभा, द्वारशाला, द्वारप्रासाद, द्वारहर्म्य एवं गोपुर संज्ञक कहे गये हैं। इनका प्रमाणसहित वर्णन प्राप्त होता है। इस प्रसंग में द्वारमान, अधिष्ठान आदि का प्रमाण, गोपुर के श्रीकर आदि पन्द्रह भेद, एकतल गोपुर, द्वितल, त्रितल, चतुस्तल, पञ्चतल, षट्तल तथा सप्ततल गोपुरों का वर्णन किया गया है। तदनन्तर गोपुर का विस्तारमान एवं उनके कूट-कोष्ठादि अंगों का विवेचन, द्वार-विस्तारमान, गोपुर के अलंकरण प्राप्त होते हैं। तत्पश्चात् द्वारशोभा, गोपुर के श्रीकर, रतिकान्त, कान्तविजय भेद; द्वारशाला के विजयविशाल, विशालालय, विप्रतिकान्त भेद; द्वारप्रासाद गोपुर के श्रीकान्त, श्रीकेश तथा केशविशाल भेद; द्वारहर्म्य गोपुर के स्वस्तिक, दिशास्वस्तिक तथा मर्दल संज्ञक भेद; द्वारगोपुर संज्ञक गोपुर के मात्राकाण्ड संज्ञक भेद निरूपित हैं। २५. मण्डप-सभा-विधान—इस अध्याय में मण्डप तथा सभा का लक्षण एवं भेद निरूपित है। सर्वप्रथम देवों, ब्राह्मणों एवं अन्य वर्ण के अनुकूल मण्डप की