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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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( ९ ) योजना का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अधिष्ठान के सामान्य लक्षण, उसके पर्याय, निर्गम-मान तथा प्रतिच्छेदविधि का भी वर्णन किया गया है। १५. पादप्रमाण-द्रव्यपरिग्रह-विधान—इस अध्याय में स्तम्भ के लक्षण, पर्याय, उसके प्रमाण, स्तम्भों के भेद, स्तम्भदण्ड का लक्षण, कलश का लक्षण, पोतिका का माप एवं उसके अंग, स्तम्भ के विशेष लक्षण, स्तम्भ के निर्माणहेतु काष्ठ, प्रस्तर एवं इष्टका का संग्रह, इस हेतु चुनने योग्य वृक्ष, शिला एवं इष्टका के लक्षण, त्याज्य वृक्ष, वृक्ष-ग्रहण करने से पूर्व किया जाने वाला पूजन-कार्य तथा काष्ठा- नयन, मुहूर्त्तस्तम्भ एवं इष्टका-निर्माण वर्णित है। १६. प्रस्तरकरण—इस अध्याय में उत्तर से प्रारम्भ होकर वृतिपर्यन्त प्रस्तर के अंगों का वर्णन किया गया है। इसमें उत्तर वाजन, प्रमालिका, दण्डिका, वलय, गोपान, कायपाद, वाजन, कपोत तथा प्रस्तर के ऊर्ध्वभाग का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त तुलाबन्ध, प्रस्तर का प्रमाण, लेप, विषम एवं सम मान, द्वार, वेदि, जालक तथा भित्ति का विवेचन किया गया है। १७. सन्धिकर्म-विधान—इस अध्याय में सन्धि की परिभाषा एवं सन्धि की विधि समझाते हुये सन्धि के भेद, सन्धि के नियम, मल्ललीला, सर्वतोभद्र, नन्द्यावर्त, स्वस्तिबन्ध, वर्धमान तथा सन्धि के अन्य भेदों का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त स्तम्भ की सन्धियाँ, शयित सन्धियाँ, विद्ध तथा कील वर्णित हैं। अध्याय के अन्त में सन्धि के दोषों का निरूपण किया गया है। १८. प्रासादोर्ध्ववर्गाः—इसके अन्तर्गत भवन के शीर्षभाग, उसके अंगों तथा अलंकरणों का वर्णन किया गया है। इसके अन्तर्गत गल्लक्षण, शिखरों के भेद, शिखरों की आकृति, स्तूपिका की ऊँचाई, लुपाओं की संख्या, पुष्कर, लुपा-प्रमाण, लुपाओं के पाँच भेद, शिखर के अंगों के प्रमाण, आच्छादन, वलयसन्धि, घटिका, लुपा के ऊपर आच्छादन, स्तूपिका की कील, ललाटभूषण, स्तूपिका, लेप एवं सुधा- कर्म, चित्रकर्म, मूर्ध्नेष्टिका, स्तूपिकाकील, मूर्ध्नेष्टकास्थापन आदि वर्णित हैं। तदनन्तर आचार्य को दान एवं दक्षिणा देना, प्रासाद में रत्न स्थापित करना, कर्मसमाप्ति, स्तूपिका- कील के वृक्षों का विवेचन, सम्प्रोक्षण कर्म, अधिवास मण्डप, कुम्भस्थापन, वास्तुदेवता बलि, चक्षुमोक्षण, सम्प्रोक्षण, स्तूपिकाकुम्भ, दक्षिणादान, सम्प्रोक्षण की आवश्यकता, सम्प्रोक्षणकाल तथा कलशस्थापन वर्णित हैं। १९. एकभूमिविधान—इस अध्याय में एक तल के प्रासादों के चार प्रकार के प्रमाण वर्णित हैं। इसमें मुखमण्डप, भवनों के पर्याय, गर्भगृह का प्रमाण, स्तूपिका- प्रमाण, द्वार, नाल-प्रमाण, अलंकरण, मन्दिरों के भेद एवं विमानतल के देवता वर्णित हैं।