मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) है। इसके अतिरिक्त वास्तुपुरुष का भी वर्णन किया गया है। ८. बलिकर्म—इस अध्याय में वास्तुमण्डल के पदों में अधिष्ठित देवों की आहत्य बलि ( व्यक्तिगत पूजा एवं हवनादि ) तथा साधारण बलि ( सभी देवों की सामूहिक पूजा एवं पूजा के सामान्य नियम ) वर्णित है। ९. ग्राम-विन्यास—इस अध्याय में ग्रामों के प्रमाण, विविध मापों पर एक दृष्टि, ग्रामादि के प्रमाण, आयादि-विचार, ग्रामादि में ब्राह्मणों की संख्या, ग्रामों के नाम, मार्ग-व्यवस्था, ग्रामों के मङ्गल एवं पुर आदि भेद, द्वार-व्यवस्था, ग्रामों में देवालय, ग्राम के प्रवेशद्वारों पर स्थापित देवता, ग्रामवास्तु के वर्ज्य स्थान, उपवन आदि के लिये श्रेणिस्थान, गृहों के लक्षण, गृहादि के विन्यास में सम्भावित दोष तथा ग्राम का शिलान्यास आदि वर्णित है। १०. नगर-विधान—इस अध्याय में नगर के प्रमाण एवं उसके विन्यास की चर्चा की गई है। इसमें माप के अनुसार नगरों के विभिन्न भेद, नगरों के चारो ओर उनके आकार के अनुसार वप्र ( चारदिवारी ) का निर्माण, वर्ज्य स्थान, मार्गविन्यास आदि का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त राजधानी का विशद् विवेचन, खेट आदि नगरों का विन्यास, दुर्गों के सात भेद एवं उनके विन्यास, नगरयोजना तथा बाजार आदि के विन्यास का वर्णन प्राप्त होता है। ११. भूलम्ब-विधान—इस अध्याय में भवन की आकृति के अनुसार भूलम्ब ( तल ) का वर्णन किया गया है। इसमें तलों के अनुसार भवन के माप एवं भवन का सर्वाधिक माप वर्णित है। १२. गर्भन्यास—इस अध्याय में देवों, ब्राह्मणों तथा अन्य जातियों के भवनों में शिलान्यास तथा नींव में रखी जाने वाली वस्तुओं का विशद् वर्णन प्राप्त होता है। इसके अन्तर्गत फेला ( पिटारी ), गर्भस्थापन ( नींव के गर्त में शिलान्यास-सामग्री रखना ), शिवालय का गर्भस्थापन, विष्णु, ब्रह्मा, षण्मुख आदि देवों के मन्दिरों में गर्भस्थापन, मनुष्यों के आवास का गर्भस्थापन, गर्भस्थापन का मन्त्र, वापी आदि का शिलान्यास तथा इष्टकाविन्यास वर्णित है। १३. उपपीठ-विधान—भवन के निर्माण में उपपीठ ( कुर्सी ) का निर्माण उसकी ऊँचाई, शोभा एवं रक्षा-हेतु होता है। इसके ऊपर अधिष्ठान आदि स्थापित होते हैं। इनके वेदिभद्र, प्रतिभद्र तथा सुभद्रभेद लक्षणसहित विस्तार से वर्णित है। १४. अधिष्ठान-विधान—इस अध्याय में अधिष्ठान के लिये भूमि तैयार करना, उसका माप, ऊँचाई में अधिष्ठान के विविध अंगों की योजना के अनुसार पादबन्ध, उरगबन्ध, प्रतिक्रम, पद्मकेसर, पुष्पपुष्कल, श्रीबन्ध, मञ्चबन्ध, प्रतिबन्ध तथा कलशाधिष्ठान-