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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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( ७ ) १. संग्रहाध्याय—इस अध्याय का प्रारम्भ मङ्गलाचरण से होता है। इसमें सम्पूर्ण ग्रन्थ के वर्ण्य विषय का उल्लेख प्राप्त होता है। २. वस्तुप्रकार—इस अध्याय में प्रथमतः वस्तु एवं वास्तु की परिभाषा दी गई है। मय के अनुसार वह सभी स्थान, जहाँ देवता तथा मनुष्य निवास करते हैं, वस्तु है तथा वस्तु पर जिनका निर्माण होता है, वह वास्तु है। भूमि, प्रासाद, यान एवं शयन वस्तु है। इनमें भी सर्वप्रधान भूमि है। अतः वर्ण, गन्ध तथा रसादि से भली प्रकार भूमि की परीक्षा करनी चाहिये। इसमें अनेक प्रकार की भूमियों के लक्षण एवं वर्णानुसार अनुरूपता का वर्णन किया गया है। ३. भूपरीक्षा—इस अध्याय में भूमि के प्रशस्त एवं अप्रशस्त लक्षणों का वर्णन किया गया है। इसमें आकृति, गन्ध, वृक्षादि, रंग, रस, जलप्रवाह, मिट्टी के प्रकार, भूमि से प्राप्त होने वाली वस्तुयें, भूमि के समीप-स्थित देवालय आदि, परिवेश आदि पर सूक्ष्म विवेचन प्राप्त होता है। ४. भूपरिग्रह—भूमि पर निर्माण से पूर्व उसका संस्कार आवश्यक है। चयनित स्थान को भूतादि बाधा से मुक्त करना, हल चलाना, बीजवपन, बलिकर्म तथा भूमि- परीक्षण आदि का वर्णन इस अध्याय में किया गया है। ५. मानोपकरण—इस अध्याय में विभिन्न प्रकार के माप—परमाणु, रथरेणु, बालाग्र, लीक्षा, यूका, यव, अङ्गुल, वितस्ति, हस्त अथवा किष्कु तथा प्राजापत्य, धनुर्मुष्टि एवं धनुर्ग्रह आदि एवं उनके भेद वर्णित हैं। इसके साथ ही उनके प्रयोग के स्थलों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनन्तर स्थपति, सूत्रग्राही, तक्षक एवं वर्धकि-संज्ञक शिल्पियों का लक्षणसहित वर्णन प्राप्त होता है। ६. दिक्परिच्छेद—सही दिशा के ज्ञान के बिना समीचीन निर्माण सम्भव नहीं होता; अतः भूमि की दिशा के ज्ञानहेतु शङ्कु का प्रयोग वर्णित है। इसके लिये उचित समय, भूमि को तैयार करना, शङ्कु-निर्माण, शङ्कु से पड़ने वाली छाया से पूर्व आदि दिशाओं का निर्धारण एवं अपच्छाया का ज्ञान आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त इस अध्याय में रज्जु-लक्षण, खातशङ्कु-लक्षण, सूत्रविन्यास तथा अपच्छाया का वर्णन किया गया है। ७. पदविन्यास—इस अध्याय में वास्तु-पद-विन्यास का विशद् वर्णन प्राप्त होता है। इसमें बत्तीस पदविन्यासों की सूची; सकल, पेचक, पीठ, महापीठ, उपपीठ आदि कतिपय पदविन्यासों का वर्णन; वास्तुदेवों का वर्णन तथा उनके स्थानों का विवेचन किया गया है। पदविन्यासों में मण्डूकपद वास्तु (चौंसठ पद वास्तु) एवं परमशायिन (इक्यासी पद वास्तु) प्रधान हैं; अतः उनका विस्तार से वर्णन किया गया