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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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( ६ ) 'मयमत' ग्रन्थ में वास्तु के स्थान पर 'वस्तु' पद का प्रयोग किया है। मय के अनुसार वस्तु ही मूल है। इनके अनुसार वस्तु से उत्पन्न पदार्थ 'वास्तु' है। इन्होंने पृथिवी को प्रथम वस्तु माना है। इसके अतिरिक्त प्रासाद, यान एवं शयन भी वास्तु की श्रेणी में परिगणित हैं। अमर्त्याश्चैव मर्त्याश्च यत्र यत्र वसन्ति हि। तद्वस्त्विति मतं तज्ज्ञैस्तद्भेदांश्च वदाम्यहम्।। भूप्रासाद्यानानि शयनं च चतुर्विधम्। भूरेव मुख्यवस्तु स्यात्तत्र जातानि यानि हि।। ( मयमत-२.१-२ ) अतः उन्होंने वास्तुशास्त्र के स्थान पर सभी जगह 'वस्तुशास्त्र' का प्रयोग किया है; जबकि अन्य ग्रन्थकार 'वास्तुशास्त्र' पद का प्रयोग करते हैं। इस ग्रन्थ का अन्य वैशिष्ट्य नींव में गर्भविन्यास है। प्रत्येक स्थान के लिये भवन के गर्भ में रखे जाने वाले पदार्थों एवं सम्पूर्ण भवन के गर्भ में रखे जाने वाले पदार्थों ( गर्भविन्यास ) का स्वतन्त्र रूप से एवं प्रकरण के अनुसार विवेचन किया गया है। असुरराज मय शैव मत में अपनी पूर्ण आस्था रखते हैं। प्रतिमा-लक्षण संज्ञक अध्याय में यद्यपि सभी देवी-देवताओं की प्रतिमायें लक्षणसहित वर्णित हैं तथापि शिव की प्रतिमाओं एवं शिवलिङ्गों के लक्षण एवं निर्माण आदि पर विशेष प्रकाश डाला गया है। विषय-वस्तु अनेक वैशिष्ट्यों से युक्त इस ग्रन्थ का विषयवस्तु इस प्रकार है— यह ग्रन्थ ३६ अध्यायों में विभक्त है। इसका प्रथम अध्याय संग्रहाध्याय, दूसरा वस्तुप्रकार, तीसरा भूपरीक्षा, चौथा भूपरिग्रह, पाँचवाँ मानोपकरण, छठा दिक्परिच्छेद, सातवाँ पदविन्यास, आठवाँ बलिकर्म, नवाँ ग्रामविन्यास, दसवाँ नगरविधान, ग्यारहवाँ भूलम्बविधान, बारहवाँ गर्भविन्यास, तेरहवाँ उपपीठविधान, चौदहवाँ अधिष्ठानविधान, पन्द्रहवाँ पादप्रमाण-द्रव्यपरिग्रहविधान, अट्ठारहवाँ प्रासादोर्ध्ववर्ग, उन्तीसवाँ एकभूमिविधान तथा बीसवाँ द्विभूमिविधान है। इसके पश्चात् क्रमशः त्रिभूमिविधान, चतुर्भूम्यादि बहु- भूमिविधान, प्राकारपरिवारविधान, गोपुरविधान, मण्डप-सभाविधान, शालाविधान, चतुर्गृह- विधान, गृहप्रवेश, राजवेश्मविधान, द्वारविधान, यानाधिकार, शयनासनाधिकार, लिङ्गलक्षण, पीठलक्षण, अनुकर्मविधान तथा प्रतिमालक्षण संज्ञक अध्याय हैं। ग्रन्थ के अन्त में कूपारम्भ संज्ञक परिशिष्ट प्राप्त होता है।