भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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द्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः १०९ वामे च कुक्कुटं दद्याद् दक्षिणे च मयूरकम् । अक्षसूत्रं पुरः स्थाप्यं गर्भं षण्मुखसद्मनि ॥५३॥ कार्त्तिकेय-मन्दिर का शिलान्यास—षण्मुख ( कार्त्तिकेय ) के मन्दिर के गर्भ में सुवर्णमय स्वस्तिक, अक्षमाला, शक्ति, चक्र, कुक्कुट ( मुर्गा ) एवं मोर तथा लोहे की शक्ति मध्य भाग में स्थापित करनी चाहिये। वाम भाग में कुक्कुट एवं दाहिने भाग में मोर रखना चाहिये। अक्षमाला को सम्मुख स्थापित करना चाहिये।।५२-५३।। अम्बुजं चाङ्कुशं पाशं सिंहं सवितृधामके । वज्रेभं नन्दकं चक्रं चामरं धाम्नि वज्रिणः ॥५४॥ अन्य देवों के लिये गर्भव्यास की सामग्री—सवितृ देवता के भवन में कमल, अंकुश, पाश एवं सिंह तथा इन्द्र के भवन में वज्र, गज, तलवार एवं चामर स्थापित करना चाहिये।।५४।। जाम्बूनदमयं मेषं शक्तिं पावकधामनि । अयसा महिषं पाशं हेमजं यमधामनि ॥५५॥ अग्नि के भवन में सुवर्णनिर्मित मेष एवं शक्ति तथा यम के भवन में लोहे का महिष एवं सुवर्णमय पाश स्थापित करना चाहिये।।५५।। अयसा नन्दकं गर्भं निर्ऋतेस्तु विमानके । वरुणे मकरं पाशं लोहजं हेमजं तथा ॥५६॥ निर्ऋति के भवन में लोहे की तलवार तथा वरुण के भवन में लोहे का मकर एवं सुवर्णमय पाश गर्भस्थान में रखना चाहिये।।५६।। वायोः कृष्णमृगं हैमं व्यालं तारापतेः क्षिपेत् । नरवाहे नरः प्रोक्तो मकरो मदनालये ॥५७॥ गर्भव्यास में वायु के भवन में कृष्ण वर्ण का मृग तथा तारापति ( चन्द्रमा ) के भवन में सुवर्णनिर्मित व्याल स्थापित करना चाहिये। कुबेर के भवन में मनुष्य ( की प्रतिमा ) एवं मदन ( कामदेव ) के भवन में मकर स्थापित करना चाहिये।।५७।। टङ्कं दन्ताक्षमाला च विघ्नेशावासगर्भके । ओङ्कारं वक्रदण्डं च सौवर्णं चार्यकस्य तु ॥५८॥ विघ्नेश ( गणेश ) के भवन के गर्भ में कुठारदन्त ( गजदन्त ) एवं अक्षमाला स्थापित करनी चाहिये। आर्यक के भवन में सुवर्णनिर्मित टेढ़ा दण्ड एवं ओम् स्थापित करना चाहिये।।५८।।