भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१०८ मयमतम् इस प्रकार शिवालय के भू-गर्भ विन्यास की विधि का वर्णन किया गया। अब अन्य मन्दिरों के गर्भ-विन्यास का वर्णन किया जा रहा है। ❋ विष्णुगर्भम् ❋ विष्णुधिष्ण्ये च गर्भं स्याद्धैमं चक्रं तु मध्यमे ॥४६॥ शङ्खकार्मुकदण्डं च रुक्ममायसनन्दकम्। धनुः शङ्खं च वामे तु खड्गं दण्डं च दक्षिणे ॥४७॥ प्रमुखे वैनतेयं च स्थापयेद्धेमनिर्मितम्। विष्णुमन्दिर का शिलान्यास—विष्णुदेव के भवन में मध्य भाग में सुवर्णनिर्मित चक्र स्थापित करना चाहिये। शङ्ख, धनुष, दण्ड सुवर्ण-निर्मित एवं लोहे की तलवार होनी चाहिये। धनुष एवं शङ्ख वाम भाग में तथा खड्ग एवं दण्ड दक्षिण भाग में होना चाहिये। सामने सोने का गरुड स्थापित करना चाहिये।॥४६-४७॥ ❋ ब्रह्मगर्भम् ❋ यज्ञोपवीतमोङ्कारं स्वस्तिकाग्निं च हेमजम् ॥४८॥ पद्मं कमण्डलुं चाक्षसूत्रदर्भश्च ताम्रजाः। ब्रह्मासनपदे मध्येऽम्बुरुहं स्थाप्यमेव च ॥४९॥ ब्रह्मा के मन्दिर का शिलान्यास—ब्रह्मा के मन्दिर में जनेऊ, ॐकार, स्वस्तिक एवं अग्नि सुवर्णनिर्मित स्थापित करना चाहिये। पद्म, कमण्डलु, अक्षमाला एवं कुश ताम्रनिर्मित रखना चाहिये। ब्रह्मा के स्थान के मध्य में कमल स्थापित होना चाहिये। तस्मिन्मध्ये तदोङ्कारं यज्ञसूत्रावृतं तु तत्। स्वस्तिकानि चतुर्दिक्षु वामे स्थाप्यं कमण्डलु ॥५०॥ उसके मध्य में जनेऊ से लपेटा हुआ ॐकार, चारो दिशाओं में स्वस्तिक तथा वाम भाग में कमण्डलु स्थापित करना चाहिये।॥५०॥ कुशाक्षमालां वामे तु पुरस्तीक्ष्णानलं क्षिपेत्। ब्रह्मगर्भमिदं प्रोक्तं ब्रह्मस्थाने प्रतिष्ठितम् ॥५१॥ वाम भाग में कुश एवं अक्षमाला तथा सम्मुख तीक्ष्ण अग्नि स्थापित करनी चाहिये। ब्रह्मस्थान में स्थापित होने वाले ब्रह्मगर्भ का वर्णन इस प्रकार किया गया।॥५१॥ ❋ षण्मुखगर्भम् ❋ स्वस्तिकं चाक्षमालां च शक्तिं चक्रञ्च कुक्कुटम्। मयूरं चैव सौवर्णमयसा शक्तिमध्यमे ॥५२॥

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