मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः १०७ वाला) वस्त्र, श्वेत (चन्दन आदि) का लेप एवं सिर पर श्वेत पुष्प धारण करना चाहिये।।३७-३९।। ध्यात्वा धरातलं सर्वं दिग्द्विपेन्द्रसमन्वितम् । ससागरं सशैलेन्द्रमनन्तस्योपरि स्थितम् ॥४०॥ (इसके पश्चात्) पृथिवी देवी का ध्यान करना चाहिये। वह दिग्गजों से युक्त हो, सागर एवं पर्वतराज से युक्त हो तथा अनन्त नाग के ऊपर स्थित हो (इस रूप में पृथिवी का ध्यान करना चाहिये) ।।४०।। सृष्टिस्थितिलयाधारं भुवनाधिपतिं जपेत् । ब्रह्मादीनां च देवानां देवीनां द्वारदक्षिणे ॥४१॥ स्तम्भमूले यथायोगं गर्ते गर्भं निधापयेत् । होमस्तम्भे प्रतिस्तम्भे पादुकाच्च प्रतेरधः ॥४२॥ (पृथिवी का ध्यान करने के पश्चात्) सृष्टि, स्थिति एवं विनाश के आधारभूत संसार के स्वामी का जप करना चाहिये। ब्रह्मा आदि देवों एवं देवियों के (मन्दिर के) दक्षिण द्वार के स्तम्भ के मूल में, होमस्तम्भ के नीचे, प्रतिस्तम्भ के नीचे, पादुका से प्रति के नीचे उचित रीति से रखना चाहिये।।४१-४२।। तस्मादत्युन्नतं निम्नं गर्भं सम्पद्विनाशकृत् । चतुरस्त्रीकृता सारवृक्षपाषाणनिर्मिता ॥४३॥ नियत स्थान से ऊँचा या नीचा गर्भ-स्थापन सम्पत्ति के विनाश का कारण होता है। मञ्जूषा-स्थापन के पश्चात् सार-वृक्ष के काष्ठ या पाषाण-खण्डों से भूमि को चौकोर बनाना चाहिये।।४३।। पात्रद्विगुणविस्तारा पञ्चाङ्गुलधनान्विता । प्रतिमाफलका या सा स्थाप्या तद्भाजनोपरि ॥४४॥ इस पात्र के ऊपर पात्र का दुगना चौड़ा एवं पाँच अंगुल मोटा प्रतिमाफलक स्थापित करना चाहिये।।४४।। तदूर्ध्वे स्थापयेत् स्तम्भं संश्लिष्टचतुरिष्टकम् । सरत्नौषधिभिर्युक्तं वस्त्रपुष्पादिशोभितम् ॥४५॥ उसके ऊपर चार ईंटों से जुड़े हुये स्तम्भ की स्थापना करनी चाहिये। वह स्तम्भ रत्न एवं ओषधियों से युक्त हो एवं वस्त्र तथा पुष्प आदि से अलङ्कृत हो।।४५।। ईशगर्भमिदं प्रोक्तमन्येषां तु प्रवक्ष्यते ।