भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१०६ मयमतम्

  • शिवगर्भम् * कपालशूलखट्वाङ्गं परशुं वृषभं तथा । पिनाकं हरिणं पाशं हैमं पूर्वादिषु न्यसेत् ॥३३॥ शिवालय का शिलान्यास—शिवालय के भूगर्भ में पूर्व दिशा से प्रारम्भ कर सुवर्ण-निर्मित कपाल, शूल, खट्वाङ्ग, परशु, वृषभ, पिनाक धनुष, हरिण एवं पाश का गर्भन्यास करना चाहिये।। ३३ ।। कार्त्तस्वरमयं चाष्टमङ्गलं तत्र पूर्ववत् । दर्पणं पूर्णकुम्भं च वृषभं युग्मचामरम् ॥३४॥ श्रीवत्सं स्वस्तिकं शङ्खं दीपं देवाष्टमङ्गलम् । स्थापकस्यानुशिष्यस्तान् स्थपतिः क्रमश्रो न्यसेत् ॥३५॥ उपर्युक्त क्रमानुसार ही आठ मंगल पदार्थ रखना चाहिये। दर्पण, पूर्णकुम्भ (जल भरा घट), वृषभ, चामर का जोड़ा, श्रीवत्स, स्वस्तिक, शंख एवं दीप—ये सभी देवों के अष्टमंगल होते हैं। स्थापक के अनुसार स्थपति को इन्हें क्रमशः स्थापित करना चाहिये।। ३४-३५ ।। आच्छाद्य भाजनं शुभ्रं पिधानेन तु निश्चलम् । तमेवाराध्य गन्धाद्यैः स्नापयेत् कलशोदकैः ॥३६॥ उस पवित्र एवं दृढ़ मञ्जूषापात्र को ढक्कन से ढँक कर उसकी गन्ध आदि से पूजा करे एवं एक कलश के जल से उसे स्नान कराये।। ३६ ।। विप्रस्वाध्यायघोषैश्च शङ्खभेर्यादिनिःस्वनैः । कल्याणजयघोषैश्च स्थपतिः स्थापकेन तु ॥३७॥ पुष्पकुण्डलहारादिकटकैरङ्गुलीयकैः । पञ्चाङ्गभूषणैर्हेमनिर्मितैश्च विभूषणैः ॥३८॥ हेमयज्ञोपवीतस्तु नववस्त्रोत्तरीयकः । श्वेतानुलेपनश्चैव सितपुष्पशिराः शुचिः ॥३९॥ जिस समय ब्राह्मण वेदमन्त्रों का उच्चारण कर रहे हों, शंख एवं भेरी आदि वाद्यों के स्वर हो रहे हों, कल्याण एवं जय का उद्घोष हो रहा हो, उस समय स्थपति एवं स्थापक को अपने शरीर को पुष्प, कुण्डल, हार, कटक (बाजूबन्द) एवं अंगूठी— इन पञ्चाङ्ग आभूषणों से सुसज्जित करना चाहिये। ये आभूषण सुवर्णनिर्मित होने चाहिये। पवित्र होकर उन्हें सोने का जनेऊ, नया उत्तरीयक (शरीर के ऊपर ओढ़ा जाने