मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः १०५ उपर्युक्त वस्तुओं को ईशान कोण से प्रारम्भ करते हुये (प्रदक्षिणक्रम से) आठो दिशाओं (एवं कोणों) में रखना चाहिये। इसके पश्चात् जयन्त के पद पर सिन्दूर एवं भृश पर हरिताल रखना चाहिये।।२५।। मनःशिला च वितथे भृङ्गराजे तु माक्षिकम्। राजावर्तं तु सुग्रीवे शोषे गैरिकमीरितम् ॥२६॥ अञ्जनं गणमुख्ये स्यादुदितौ दरदं विदुः । मध्यमे पद्मरागं तु मरीचौ विद्रुमं मतम् ॥२७॥ सविन्द्रे पुष्परागं तु वैडूर्यं स्याद् विवस्वति । वज्रमिन्द्रजये विद्यादिन्द्रनीलं तु मित्रके ॥२८॥ रुद्रराजे महानीलं मरकतं तु महीधरे । मुक्तापवत्से मध्यादिपूर्वेण क्रमशॊ न्यसेत् ॥२९॥ वितथ के पद पर मनःशिला (मैनसिल), भृङ्गराज पर माक्षिक (लाल खड़िया), सुग्रीव पर लाजावर्त, शोष पर गेरु, गणमुख्य पर अञ्जन, उदित पर दरद (लाल ताँबा), मध्य भाग पर पद्मराग (रूबी पत्थर), मरीचि पर मूँगा, सविन्द्र पर पुष्पराग, विवस्वान् पर वैडूर्य मणि, इन्द्रजय पर हीरा, मित्र पर इन्द्रनील, रुद्रराज पर महानील, महीधर पर मरकत (पन्ना) एवं आपवत्स पर मोती का स्थापन करना चाहिये। इन सभी पदार्थों को मध्य से प्रारम्भ कर पूर्व क्रम से क्रमानुसार रखना चाहिये। विष्णुकान्ता त्रिशूला श्रीः सहा दूर्वा च भृङ्ककम् । अपामार्गैकपत्राब्जमीशादिष्वौषधान्न्यसेत् ॥३०॥ उपर्युक्त कोष्ठों में इन ओषधियों को ईशान कोण से प्रारम्भ करते हुये रखना चाहिये—विष्णुकान्ता, त्रिशूला, श्री, सहा, दूर्वा, भृङ्क, अपामार्ग तथा एकपत्राब्ज ।।३०।। चन्दनागरुकर्पूरलवङ्गैलालताफलम् । तक्कोलेनाष्टगन्धांस्तु जयन्तादिषु विन्यसेत् ॥३१॥ जयन्त आदि के कोष्ठों में चन्दन, अगरु, कपूर, लवङ्ग, इलायची, लताफल, तक्कोल एवं इना—इन आठ गन्धयुक्त पदार्थों को रखना चाहिये।।३१।। स्वस्तिकानि चतुर्दिक्षु हेमायस्ताम्ररूप्यकैः । सर्वेषामपि सामान्यमेतच्चिह्नैस्तु लक्ष्यते ॥३२॥ चारो दिशाओं में सुवर्ण, अयस्, ताम्र एवं रूप्यक (रूपा, चाँदी) द्वारा निर्मित स्वस्तिक रखना चाहिये। सभी देवों के लिये ये सभी सामान्य हैं; किन्तु उनको उनके विशेष चिह्नों से युक्त किया जाता है।।३२।।