भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१०४ मयमतम् सुगन्धोदकसम्पूणान् गन्धपुष्पसमर्चितान् । निष्कलङ्कान्सुषिरान् पञ्चपञ्चैव सूत्रितान् ॥१९॥ वास्तु-देवों की पूजा गन्ध एवं पुष्प आदि से करके संसार के स्वामी (शिव) का जप करना चाहिये। इसके पश्चात् पाँच-पाँच कलशों का न्यास करना चाहिये। इन कलशों को वस्त्रों से सजाना चाहिये, उनमें सुगन्धित जल से भरना चाहिये तथा गन्ध एवं पुष्पों से उनकी पूजा करनी चाहिये। इन कलशों को दोषरहित, छिद्ररहित एवं एक सूत्र (एक लाइन) में रक्खा होना चाहिये ॥१८-१९॥ तस्य प्रदक्षिणे गन्धशालिस्थण्डिलमण्डले । आराध्य गन्धपुष्पाद्यैर्बलिं दत्त्वा यथाविधि ॥२०॥ भाजनाय ततः पात्रं वेष्टयेच्छ्वेतवाससा । श्वेतवस्त्रान्तरस्योर्ध्वं न्यसेद् दर्भास्तरे शुचिः ॥२१॥ शालि धान्य के ऊपर निर्मित स्थण्डिल मण्डल के ऊपर प्रदक्षिणक्रम से (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर) गन्ध एवं पुष्प आदि से वास्तुदेवों को नियमानुसार बलि प्रदान कर एवं उनकी पूजा करने के पश्चात् मञ्जूषा-पात्र को श्वेत वस्त्र से लपेटना चाहिये। उसके ऊपर श्वेत वस्त्र को फैलाना चाहिये एवं उसके ऊपर दर्भ (कुश) बिछाना चाहिये॥२०-२१॥ पीत्वा शुद्धं पयो रात्रावुपोष्याधिवसेत्ततः । स्थपतिः शास्त्रवित् प्राज्ञः सूत्रग्राह्यादिसेवितः ॥२२॥ तदनन्तर सूत्रग्राही आदि के द्वारा सम्मानित बुद्धिमान एवं वास्तुशास्त्र के ज्ञाता स्थपति को शुद्ध जल पान कर रात्रि को उपवास करना चाहिये ॥२२॥ धान्यादीन्यथ वस्तूनि भाजनाभ्यन्तरे न्यसेत् । हेमराजतशुल्बैश्च शालिव्रीहिकुलत्थकान् ॥२३॥ त्रपुणा कङ्गु सीसेन माषो मुद्गोऽयसायसा । कोद्रवं च तिलं भाव्यं वैकृन्तेन प्रयत्नतः ॥२४॥ (अगले दिन) मञ्जूषा में प्रयत्नपूर्वक धान्य आदि वस्तुओं को रखना चाहिये। ये पदार्थ हैं—सोने के शालि, चाँदी के व्रीहि, ताँबे के कुलत्थ, राँगे के कङ्गु, सीसे के उड़द, अयस् (लोहे) के मूँग, अयस् के कोदो तथा पारे के तिल॥२३-२४॥ ईशादिषु न्यसेदेतान्यष्टदिक्षु यथाक्रमम् । जयन्ते जातिहिङ्गुल्यं हरितालं भृशे मतम् ॥२५॥