मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 127, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः १०३ अथवा भवन के स्तम्भ के विष्कम्भ (घेरा) से आठ भाग कम मञ्जूषा का माप रखना चाहिये। मञ्जूषा की चौड़ाई फेला (गर्त के तल का मेहराब) का तीन चौथाई भाग या पूर्ववर्णित माप के अनुसार रखना चाहिये।।१२।। त्रिवर्गमण्डपाकारं वृत्तं वा चतुरस्रकम्। पञ्चविंशतिकोष्ठं वा नवकोष्ठकमेव वा ।।१३।। मञ्जूषा की आकृति त्रिवर्ग मण्डप के सदृश, वृत्ताकार अथवा चौकोर होना चाहिये। इसमें पच्चीस कोष्ठ या नौ कोष्ठ होना चाहिये।।१३।। फेलोच्चार्धत्रिभागैकं कोष्ठभित्त्युच्छ्रयं भवेत्। तद्भित्तिघनतां कुर्याद् यवैर्द्वित्रिचतुष्टयैः ।।१४।। उपपीठपदे देवाः पञ्चविंशति सम्मताः। फेला की ऊँचाई के तीन भाग करने चाहिये। उसके एक भाग के बराबर कोष्ठ की भित्ति की ऊँचाई होनी चाहिये। उस भित्ति की मोटाई दो, तीन या चार यव (विना छिलके वाले यव के मध्य भाग की चौड़ाई) के बराबर रखनी चाहिये। उपपीठ वास्तु- विन्यास पर पच्चीस वास्तुदेवों को स्थापित करना चाहिये।।१४।। ✹ गर्भस्थापनम् ✹ श्वभ्रोर्ध्वभूतलं सर्वं गन्धैः पुष्पैश्च दीपकैः ।।१५।। वासयित्वा तु पूर्वेद्युः पञ्चगव्यैस्तु भाजनम्। प्रक्षाल्य सूत्रैरावेष्ट्य शुद्धशाल्यास्तरे शुभे ।।१६।। नींव में वास्तु-पूजन की सामग्री रखना—जिस दिन गर्भस्थापन का विधान करना हो, उसके एक दिन पूर्व गर्त के ऊपर की (आस-पास की) भूमि को सभी प्रकार के गन्धों से सुवासित कर पुष्पों तथा दीपकों से सुसज्जित करना चाहिये। मञ्जूषापात्र को पञ्चगव्य (गाय का दूध, दही, घी, मूत्र एवं गोबर) से स्वच्छ कर उस पर सूत्र लपेटना चाहिये। इसके पश्चात् भूमि पर शुद्ध शालि का धान बिछाना चाहिये। स्थण्डिले चण्डितं कृत्वा मण्डूकं वाऽथ तत्परम्। विन्यस्य देवान् ब्रह्मादीन् श्वेततण्डुलधारया ।।१७।। उस शालि के आस्तरण पर चण्डित अथवा मण्डूक वास्तुपद का विन्यास कर श्वेत तण्डुल की धारा के द्वारा ब्रह्मा आदि वास्तुदेवों का पदविन्यास करना चाहिये।।१७।। आराध्य गन्धपुष्पाद्यैर्भुवनाधिपतिं जपेत्। स्थपतिः कलशान् न्यस्य सर्वान् वस्त्रविभूषितान् ।।१८।।