भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१०२ मयमतम् तदूर्ध्वं तस्य मध्ये तु पद्मकन्दं न्यसेत् पुनः। पूर्वे चोत्पलकन्दं च दक्षिणे कौमुदं क्षिपेत् ॥६॥ उसके ऊपर गर्त के मध्य में पद्म ( लाल कमल ) की जड़, पूर्व दिशा में उत्पल ( नीलकमल ) की जड़ एवं दक्षिण में कुमुद ( की जड़ ) डालनी चाहिये।।६।। सौगन्धिं पश्चिमे विद्यात् नीललोहमुदग्दिशि। धान्यान्यष्टौ तदूर्ध्वं तु शालिर्व्रीहिश्च कोद्रवः ॥७॥ कङ्गुं मुद्गं च माषं च कुलत्थं च तिलं तथा। प्रादक्षिण्‍येन शाल्यादीनीशानादिषु विन्यसेत् ॥८॥ पश्चिम दिशा में सौगन्धि ( एक प्रकार की सुगन्धित घास ), उत्तर दिशा में नील- लोह ( नीले या काले रंग का धातु ) डालना चाहिये। उनके ऊपर आठो दिशाओं में आठ धान्यशालि ( चावल का एक प्रकार ), व्रीहि ( चावल का एक प्रकार ), कोद्रव ( कोदो ), कङ्गु, मुद्ग ( मूँग ), माष ( उड़द ), कुलत्थ ( कुलथा ) एवं तिल को प्रदक्षिण- क्रम से ईशान से प्रारम्भ करते हुये गर्त में डालना चाहिये।।७-८।। ❋ फेला ❋ तस्योपरि निधातव्यं मञ्जूषं ताम्रनिर्मितम्। त्रिचतुर्मात्रविस्ताराद् द्विद्व्यङ्गुलविवर्धनात् ॥९॥ पञ्चषड्विंशमात्रान्तं मानं द्वादश भाजने। समोच्चं वाऽष्टषट्पञ्चभागोनं वा तदुच्छ्रयम् ॥१०॥ पेटी—उसके ऊपर ताँबे से निर्मित मञ्जूषा ( पेटी, बाक्स ) रखना चाहिये। प्रमाण की दृष्टि से यह पात्र चौड़ाई में तीन या चार अंगुल से प्रारम्भ करते हुये दो-दो अंगुल की वृद्धि के साथ पच्चीस-छब्बीस अंगुलपर्यन्त बारह प्रकार का होता है। इसकी ऊँचाई इसकी चौड़ाई के बराबर अथवा आठ, छः या पाँच भाग कम रखनी चाहिये। एकादिद्वादशान्तानां हर्म्याणामुदितं क्रमात्। गृहीतोच्चत्रिभागैकं पादालम्बिविधानकम् ॥११॥ उपर्युक्त माप एक से बारह तलपर्यन्त भवनों के क्रमानुसार वर्णित हैं। ( अथवा ) पादलम्ब ( स्तम्भ ) के विधान के अनुसार गृह की ऊँचाई के तीसरे भाग के प्रमाण को ग्रहण करना चाहिये।।११।। तत्तद्धर्म्याङ्घ्रिविष्कम्भसमं वाष्टांशहीनकम्। त्रिपादं वा विशालं तत्फेलायाः प्राग्वोच्छ्रयम् ॥१२॥