मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वादशोऽध्यायः ( गर्भविन्यासः ) तैतिलानां द्विजातीनां वर्णानां हर्म्यके गृहे । गर्भविन्यासविधिः सम्यक् संक्षेपाद् वक्ष्यतेऽधुना ॥१॥ शिलान्यास—देवों के, ब्राह्मणों के एवं अन्य वर्ण वालों के भवनों के गर्भविन्यास ( शिलान्यास ) की विधि का भली-भाँति एवं संक्षेप में अब वर्णन किया जा रहा है॥१॥ सर्वद्रव्यैस्तु सम्पन्नं गर्भं तत् सम्पदां पदम् । द्रव्यहीनमसम्पन्नं गर्भं सर्वविपत्करम् ॥२॥ सभी पदार्थों से युक्त गर्भ ( भवन की नींव का गर्त ) सम्पदा का स्थल होता है तथा किसी पदार्थ के कम होने से अथवा गर्भविन्यास न होने से वह गर्भ सभी प्रकार की विपत्तियों का कारण ( उस पर निर्मित भवन एवं भवन के निवासियों के लिये ) बनता है॥२॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गर्भं सम्यग् विनिक्षिपेत् । गर्भश्वभ्रस्य गाम्भीर्यं स्वाधिष्ठानोन्नते समम् ॥३॥ इसलिये सभी प्रकार के प्रयत्नपूर्वक गर्भ का न्यास करना चाहिये। गर्भ के गर्त की गहराई को अधिष्ठान की ऊँचाई तक समतल करना चाहिये॥३॥ चतुरस्रसमं कुर्यात् गर्तमिष्टकयाश्मना । आपूर्य सलिलं तस्य मूले सर्वमृदं क्षिपेत् ॥४॥ गर्त को ईंटों एवं पत्थरों से सम एवं चौकोर करना चाहिये। पानी से गड्ढे को भरने के बाद इसके मूल में सभी प्रकार की मिट्टियाँ डालनी चाहिये॥४॥ निम्नगाह्रदसस्याद्रिवल्मीककुलिरावटे । हलस्थलाब्धिगोशृङ्गहस्तिदन्तेषु मृत्तिका ॥५॥ यह मृत्तिका नदी से, तालाब से, अन्न के खेत से, पर्वत से, बाँबी से, हल से, बैल के सींग से एवं गजदन्त से प्राप्त होती है॥५॥