मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः १११ निर्मित, सिंह एवं शंख रजत-निर्मित, मृग ताम्र-निर्मित तथा तलवार लोहा-निर्मित स्थापित करना चाहिये। क्षेत्रपाल के मन्दिर के गर्भ-विन्यास में सुवर्णनिर्मित खट्वाङ्ग, तलवार एवं शक्ति स्थापित करनी चाहिये।।६४-६५।। पद्मं लक्ष्म्याः सरस्वत्या ओङ्कारं च त्रिवर्णकम्। ध्वाङ्क्षकेतूत्पलं हैमं ज्येष्ठाकोष्ठस्य गर्भके ॥६६॥ सुवर्णपद्म लक्ष्मी-मन्दिर में, तीन वर्ण का ॐकार सरस्वती-मन्दिर में तथा ज्येष्ठा के मन्दिर में सुवर्णनिर्मित काक, केतु एवं कमल गर्भ में स्थापित करना चाहिये।।६६।। कपालशूलघण्टाभिः प्रेतान् कालीगृहे न्यसेत्। हंसोक्षशिखिताक्ष्र्याँश्च सिंहेभप्रेतरूपकान् ॥६७॥ जाम्बूनदमयान् मातृकोष्ठकेषु निधापयेत्। पद्माक्षसूत्रकं दीपं रोहिणीगृहगर्भके ॥६८॥ काली-मन्दिर के गर्भविन्यास में कपाल, शूल एवं घण्टों के साथ प्रेतों को स्थापित करना चाहिये। मातृकाओं के भवन के गर्भ में हंस, वृषभ, मयूर, गरुड़, सिंह, गज एवं प्रेतों की सुवर्ण-प्रतिमायें स्थापित करनी चाहिये। रोहिणी के मन्दिर के गर्भ में पद्म, अक्षसूत्र एवं दीप स्थापित करना चाहिये।।६७-६८।। दर्पणं चाक्षमालां च पार्वतीभवने विदुः। पद्माक्षसूत्रकं पूर्णकुम्भं मोहिनीधामनि ॥६९॥ पार्वती-मन्दिर के गर्भ में दर्पण एवं अक्षमाला तथा मोहिनी-मन्दिर में पद्म, अक्षमाला एवं पूर्ण-कुम्भ स्थापित करना चाहिये।।६९।। छत्रध्वजपताकाश्च सचिह्नैः सह वाहनैः। अनुक्तानां च देवानां देवीनां गर्भमिष्यते ॥७०॥ जिन देवी एवं देवों का उल्लेख यहाँ नहीं किया गया है, उनके मन्दिर के गर्भ में उनके विशिष्ट चिह्न एवं वाहन के साथ छत्र, ध्वज एवं पताका स्थापित करनी चाहिये।।७०।। ✵ मानुषहर्म्यगर्भकम् ✵ द्विजातीनां तु वर्णानां जातिगर्भो विधीयते। करकं दन्तकाष्ठं च शुल्बं हेममयं भवेत् ॥७१॥ मनुष्य के भवन का शिलान्यास—द्विजन्मा वर्ण वालों के भवन के गर्भ में