मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ें११२ मयमतम् जिन वस्तुओं का विन्यास होता है, उनका वर्णन किया जा रहा है। उनमें करक तथा दन्तकाष्ठ ताम्रमय एवं सुवर्णमय होता है।।७१।। यज्ञोपवीतं यज्ञाग्निं यज्ञभाण्डं च राजतम्। यज्ञोपवीतमध्यस्थं यज्ञभाण्डं च दक्षिणे ॥७२॥ यज्ञोपवीत ( जनेऊ ), यज्ञाग्नि एवं यज्ञपात्र रजत-निर्मित होते हैं। यज्ञोपवीत गर्भ के मध्य में तथा यज्ञपात्र उसके दाहिने होना चाहिये।।७२।। वामे तु करकं काष्ठमनलं पुरतो भवेत्। विप्रगर्भमिदं प्रोक्तं स्वस्तिकानि चतुर्दिशि ॥७३॥ यज्ञोपवीत के वाम भाग में करक तथा दन्त-काष्ठ एवं यज्ञाग्नि सम्मुख होना चाहिये। चारो दिशाओं में स्वस्तिक होने चाहिये। ब्राह्मण के गृह का गर्भ-विन्यास इस प्रकार वर्णित है।।७३।। मध्ये हेममयं चक्रं वामे शङ्खं च राजतम्। कार्मुकं ताम्रजं वामे दण्डो रुक्मेण दक्षिणे ॥७४॥ ( क्षत्रिय के गृह का गर्भ-विन्यास इस प्रकार होना चाहिये— ) मध्य में सुवर्णमय चक्र, उसके वाम भाग में रजत-निर्मित शंख एवं ताम्रनिर्मित धनुष होना चाहिये। चक्र के दक्षिण भाग में सोने का दण्ड होना चाहिये।।७४।। खड्गं चायसमेव स्याच्चतुर्नागांश्चतुर्दिशि । हैममायसकं ताम्रं रजतं क्रमशो न्यसेत् ॥७५॥ दक्षिण भाग में ही लोहे का खड्ग तथा चारो दिशाओं में चार गज होने चाहिये। ये क्रमशः सुवर्ण, लोहा, ताँबा एवं रजत-निर्मित हों।।७५।। मध्ये श्रीरूपकं हैमं स्वस्तिकानि चतुर्दिशि । छत्रध्वजपताकाश्च दण्डं वै शासनात्मकम् ॥७६॥ मध्य भाग में सुवर्णनिर्मित श्रीरूपक एवं चारो दिशाओं में स्वस्तिक तथा छत्र, ध्वज, पताका एवं दण्ड निश्चित रूप से होना चाहिये। यह गर्भ-न्यास राजा के गृह के लिये होता है।।७६।। राजद्वारे भवेद् गर्भमन्येषां तु यथार्हकम्। वार्ष्णेयकानां गर्भं चेद् विजयद्वारदक्षिणे ॥७७॥ ये सभी गर्भ-न्यास राजभवन के द्वार के स्थान पर होने चाहिये। अन्य क्षत्रियों के गृहों में उचित स्थान पर होना चाहिये। यदि राजा 'वार्ष्णेयक' श्रेणी का हो तो यह गर्भ-न्यास विजयद्वार के दक्षिण ओर होना चाहिये।।७७।।