मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः ११३ अयसा हलजिह्वां च शङ्खं ताम्रकुलीरकम्। पञ्चायुधं सीसमाषं हयं वृषगजौ हरिम् ॥७८॥ ( वैश्य-गृहों का गर्भ-न्यास इस प्रकार होना चाहिये— ) लोहे से निर्मित हल का अग्र भाग ( जिह्वा ) एवं शंख तथा ताँबे से निर्मित केकड़ा, ( विष्णु के ) पाँच अस्त्र एवं उड़द सीसा ( लेड ) से निर्मित होना चाहिये। इनके अतिरिक्त अश्व, वृष, गज एवं सिंह होना चाहिये॥७८॥ अर्काग्निवरुणेन्दूनां स्थाने सम्यङ् निवेशयेत्। चत्वारो धेनुकाः श्वेतनिर्मिताश्च चतुर्दिशि ॥७९॥ गोपुङ्गवं च पुरतो वैश्यानां प्रविधीयते। इन्हें सूर्य, अग्नि, वरुण एवं सोम के स्थान पर भली-भाँति स्थापित करना चाहिये। श्वेत वर्ण ( रजत ) से निर्मित चार गायों को चारो दिशाओं में स्थापित करना चाहिये। वृष को वैश्यों के भवन के गर्भ में सामने रखना चाहिये॥७९॥ बीजपात्रं हलं हैमं ताम्रजं युगमिष्यते ॥८०॥ रजतेन पशुं विद्याच्चतुर्दिक्षु विनिक्षिपेत्। मध्ये गोपुङ्गवं चैव तन्निरीक्ष्य युगं पुनः ॥८१॥ ( शूद्र के गृह का गर्भ-विन्यास इस प्रकार वर्णित है— ) बीजपात्र, सोने का हल एवं ताँबे का युग ( हल का जुआ ) होना चाहिये। चारो दिशाओं में चाँदी से निर्मित पशु ( गायं ) रखना चाहिये एवं मध्य में वृष होना चाहिये, जिसके सामने जुआ रक्खा होना चाहिये॥८०-८१॥ हलं दक्षिणभागे तु वामांशे बीजपात्रकम्। बीजं हिरण्मयं शूद्रगर्भं वैश्ये च सम्मतम् ॥८२॥ वृष के दाहिने भाग में हल एवं बाँयें भाग में बीज का पात्र होना चाहिये। बीजों को सुवर्ण-निर्मित होना चाहिये। शेष गर्भ-न्यास शूद्रों के भवन के गर्भ में उसी प्रकार होना चाहिये, जिस प्रकार वैश्यों के गृह में वर्णित हैं॥८२॥ गृहाणां गृहगर्भं च जातिगर्भं विमिश्रितम्। अनेकभूमियुक्तानि यानि वासगृहाणि च ॥८३॥ सामान्य भवनों के गृहों के गर्भ-न्यास एवं जाति-विशेष के गृहों के गर्भ-न्यास को उस भवन में मिश्रित कर दिया जाता है, जो अनेक तल वाले होते हैं॥८३॥ पुष्पदन्ते च भल्लाटे महेन्द्रे च गृहक्षते। दक्षिणे नेत्रभित्तौ तु सौम्यादौ तु चतुर्गृहे ॥८४॥ मय०-८