भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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११४ मयमतम् उत्तर आदि चारो दिशाओं के मुख वाले गृहों में भिति के नेत्र ( गृह का द्वार ) के दाहिने भाग में पुष्पदन्त ( पश्चिम दिशा ), भल्लाट ( उत्तर दिशा ), महेन्द्र ( पूर्व दिशा ) एवं गृहक्षत ( दक्षिण दिशा ) के पद पर गर्भ-न्यास करना चाहिये ।।८४।। द्वारप्रदक्षिणे स्तम्भे योगे वाऽपि विधीयते । स्थाली तदुपधानं च दार्विकं तण्डुलं खजम् ।।८५।। गलक्यं दन्तकाष्ठाग्निं कृष्णां लोहं महानसे । रसोई के गर्भ-न्यास में द्वार के दाहिने भाग में अथवा स्तम्भ के नीचे स्थाली ( पकाने का पात्र ), उसका ढक्कन, करछुल, चावल, मथानी, चलनी, दाँत साफ करने का काष्ठ ( दतुअन या दातौन ) तथा अग्नि की लौह-निर्मित प्रतिमा रखनी चाहिये ।।८५।। दक्षिणे भवने गर्भः कुम्भः शाल्युदपूरितः ।।८६।। धनसद्मनि गर्भस्तु सार्गलं कुञ्चिकं भवेत् । पर्यङ्कदीपशयनं गर्भं विद्यात् सुखालये ।।८७।। रसोई के दाहिनी ओर के कक्ष में शालि ( चावल ) से भरा कुम्भ गर्भ में स्थापित करना चाहिये। धन-कक्ष के गर्भ-न्यास में चाभी एवं अर्गला होनी चाहिये। सुखालय ( विश्राम-गृह ) के गर्भ में पलंग, दीपक एवं शयन ( आसन ) स्थापित करना चाहिये। येन यत् कर्म निष्पाद्यं तेन तद्गृहगर्भकम् । यानि यस्य स्वचिह्नानि तानि तस्य निधापयेत् ।।८८।। जिन सामाग्रियों से जिन कार्यों को सम्पन्न किया जाता है, उन सामग्रियों को उनके कक्षों के गर्भ में स्थापित करना चाहिये। जो जिनके प्रतीक हों, उन चिह्नों को उसके गर्भ में स्थापित करना चाहिये ।।८८।। सभाप्रपामण्डपेषु कर्णपादे प्रदक्षिणे । द्वितीयस्तम्भके द्वारदक्षिणाङ्घ्रौ तु वा न्यसेत् ।।८९।। सभागार, प्रपा ( प्याऊ ) एवं मण्डपों में दक्षिणी कोने के स्तम्भ अथवा दूसरे स्तम्भ या द्वार के दाहिने स्तम्भ के नीचे गर्भ-स्थापन करना चाहिये ।।८९।। अयोमयगजो गर्भः कृष्णलोहेन कोद्रवः । लक्ष्मीं सरस्वतीं हेमां पात्रमध्ये तु विन्यसेत् ।।९०।। उपर्युक्त भवन-निर्माण में गर्भ-विन्यास हेतु लोहे का गज, कोदो ( अन्न-विशेष ), सुवर्ण-निर्मित लक्ष्मी एवं सरस्वती को पात्र के मध्य में रखना चाहिये ।।९०।। गर्भो नाट्यसभायां च प्रक्षिपेत् कुटिकामुखे । मण्डितस्तम्भमूले वाऽप्युभयोरपि चेष्यते ।।९१।।