भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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( १२ ) हैं। इसके पश्चात् भवन के सामान्य नियम, अलिन्द्र, गृहस्वामी का स्थान, भोगविन्यास, चुल्ली( चूल्हा )-लक्षण, चूली की संख्या तथा पुनः भोगविन्यास वर्णित है। तदनन्तर वस्तुभेदों में दिशिभद्रक, गरुड़पक्ष, कायभार, तुलानीय; द्वारों का प्रमाण, गृहनिर्माणकर्म का काल, द्वारस्थान, वासविन्यास एवं गृहारम्भ-काल निरूपित है। २८. गृहप्रवेश—यह अध्याय गृहनिर्माण के पश्चात् गृहप्रवेश से सम्बद्ध धार्मिक कृत्यों का निरूपण करता है। इसमें अधिवास, कलशस्थापन, बलिविधान, स्थपति- निर्गमन, गृहपति एवं गृहिणी का प्रवेश आदि कर्म वर्णित हैं। २९. राजवेश्म-विधान—इस अध्याय में राजवेश्म के प्रमाण, अधमवेश्म ( छोटे राजभवन ) का विन्यास, गोपुर, गृहविन्यास, परिखा, पुनः गृहविन्यास, प्रथम आवरण ( प्राकार ), द्वितीय आवरण, तृतीय आवरण, नगर, नगरभित्ति, राजवेश्म के गोपुर, वेश्मतल लम्बविधान, नरेन्द्रवेश्म, प्राकार, वेश्मविन्यास आदि वर्णित हैं। सौबल संज्ञक वेश्म का प्रथम आवरण, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ तथा पञ्चम आवरण वर्णित हैं। तदनन्तर अधिराज मन्दिर, नगर के भेद, हस्तिशाला, अश्वशाला, विभिन्न प्रकार के भवन, मन्त्रशाला, प्रसाधन कक्ष, अभिषेकशाला, तुलाभारस्थान तथा हिरण्यगर्भस्थान का विवेचन किया गया है। ३०. द्वार-विधान—इस अध्याय में द्वार के माप, योग ( चौखट ) का प्रमाण, कवाट, शुभ एवं अशुभ द्वार, द्वार के स्थान, गोपुर-प्रमाण तथा गोपुर के प्रकारों में एकतल गोपुर, द्वितल गोपुर एवं उनके रतिकान्त, कान्तविजय तथा सुमङ्गल भेद, त्रितल गोपुर तथा उनके मर्दल, मात्रखण्ड, श्रीनिकेतन संज्ञक भेद, सप्ततल गोपुर के भद्रकल्याण, सुभद्र तथा भद्रसुन्दर संज्ञक भेद, षट्टल गोपुर, पञ्चतल गोपुर, चतुस्तल गोपुर एवं उनके सामान्य नियम वर्णित हैं। ३१. यानाधिकार—इस अध्याय में यान एवं शयन के भेद, शिबिकाभेद, पीठा, अन्य शिबिकायें तथा रथ का वर्णन लक्षण एवं प्रमाणसहित प्राप्त होता है। ३२. शयनासनाधिकार—इसमें लक्षण एवं प्रमाणसहित शयन, पर्यङ्क, आसन, सिंहासन, पूजा-पाठ एवं आयादि का वर्णन किया गया है। ३३. लिङ्गलक्षण—इस अध्याय में सकल ( अभिव्यक्त अंग ), निष्कल ( बिना अंग आदि के ) तथा मिश्र लिङ्ग का वर्णन प्राप्त होता है। सकल बेर ( प्रतिमा ), निष्कल ( लिङ्ग, पिण्डी ) तथा मिश्रमुख लिङ्ग होता है। इस प्रसंग में शिलालक्षण, उचित काल एवं विधि से शिलासंग्रह; इसका मन्त्र, लिङ्ग का प्रमाण, लिङ्ग का स्थान, नागर, द्राविड़ तथा वेसर लिङ्ग, हस्तमाप से लिङ्गप्रमाण, द्वारादि के अनुसार लिङ्गमान, आयादि, लिङ्गलक्षण, सर्वतोभद्र आदि लिङ्गप्रमाण, सुरार्चित आदि लिङ्गों के भेद,