भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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आर्ष लिङ्ग, स्वयम्भू लिङ्ग, शिरोवर्तन, लक्षणोद्धरण, नागरलिङ्ग—द्राविड़ तथा वेसर लिङ्ग के लक्षणोद्धरण, सूत्र का व्यास एवं गहराई, सामान्य विधि, सूत्राग्रलक्षण, स्फाटिक लिङ्ग, मृण्मय लिङ्ग, लिङ्ग-स्थापन तथा लिङ्ग-स्थापन का फल निरूपित है। ३४. पीठलक्षण—इस अध्याय में पीठलक्षण के प्रसंग में पीठद्रव्य, पीठप्रमाण, पीठ का आकार, पीठों के नाम, भद्रपीठ, पद्मपीठ, वज्रपद्मपीठ, महाब्जपीठ, श्रीकरपीठ, पीठपद्मपीठ, महावज्र तथा सौम्यपीठ तथा श्रीकाम्यपीठ वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त पीठों के सामान्य लक्षण, ब्रह्मशिला, नन्द्यावर्त शिला, प्रतिमाओं के पीठ, पीठों के मान से प्रासाद का प्रमाण, बेर ( प्रतिमा ) के प्रमाण से प्रासाद का प्रमाण, अष्टबन्ध ( गारा ) का संग्रहण तथा गर्भगृह में बेर के स्थान निरूपित हैं। ३५. अनुकर्म-विधान—इस अध्याय में अनुकर्म-विधान के अन्तर्गत भवन का जीर्णोद्धार, लिङ्गजीर्णोद्धार, पीठजीर्णोद्धार, बेरजीर्णोद्धार, सामान्य विधि, ग्रामादिकों का जीर्णोद्धार, बाल ( अस्थायी लिङ्ग ) का स्थापन आदि वर्णित हैं। ३६. प्रतिमा-लक्षण—इस अध्याय में ब्रह्मा, विष्णु, वराह, त्रिविक्रम, नारसिंह, अनन्तशायी, महेश्वर, षोड़श मूर्तियाँ, सुखासनमूर्ति, वैवाहमूर्ति, सोमास्कन्दमूर्ति, वृषारूढ़मूर्ति, त्रिपुरान्तकमूर्ति, नृत्तमूर्तियाँ, चन्द्रशेखरमूर्ति, अर्धनारीश्वरमूर्ति, हरिहरमूर्ति, चन्द्रेशानुग्रहमूर्ति, कामारिमूर्ति, कालनाशमूर्ति, दक्षिणामूर्ति, भिक्षाटनमूर्ति, कङ्गालमूर्ति, मुखलिङ्ग, षण्मुख, गणाधिप, सूर्य, दिक्पाल—इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, चन्द्र, ईशान, काम, अश्विनद्वय, वसुगण, मरुद्गण, रुद्र, विघ्नेश्वर, क्षेत्रपाल, चण्डेश्वर, आदित्य, सप्तर्षि, सप्तरोहिणी, गरुड, शास्ता, मातृकायें, वीरभद्र, ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, विनायक, मातृकाओं की स्थापना, चामुण्डी, परिवार, लक्ष्मी, यक्षिणी, कात्यायनी, दुर्गा, सरस्वती, ज्येष्ठा, भूमि, पार्वती, सप्तमाता, बुद्ध, जिन, सामान्य विधि, बेर के प्रमाण, जङ्गम बेर के प्रमाण तथा द्वारपाल की मूर्तियों के लक्षण प्रमाणसहित वर्णित हैं। परिशिष्ट—इसमें कूप के निर्माण के विषय में विविध विद्वानों के मत उद्धृत हैं। इस प्रकार विषयवस्तु की दृष्टि से मयमत ग्रन्थ में प्रथम 'वस्तु' ( अथवा वास्तु ) भूमि है। तदनन्तर ग्राम-नगरादि का स्थान आता है। इसके पश्चात् देवों एवं चारो वर्णों के लिये भूमि, भवन, यान तथा शयनासन का स्थान आता है। तीसरे एवं चौथे अध्याय में भूमि के परीक्षण का वर्णन प्राप्त होता है। तदनन्तर माप के विभिन्न प्रकारों एवं ईकाइयों का निरूपण किया गया है। चार प्रकार के शिल्पी—स्थपति, सूत्रग्राही, तक्षक तथा वर्धकि निर्माणकार्य के अभिन्न अंग हैं; अतः इनका ग्रन्थ में विस्तार से वर्णन किया गया है। निर्माणहेतु दिशा का सटीक ज्ञान एवं कार्य के अनुसार वास्तुपद-

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