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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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( १४ ) विन्यास आवश्यक होता है। अतः ग्रन्थ में इनका विवेचन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त ग्राम, नगर, भवन, नींव में गर्भविन्यास, उपपीठ, अधिष्ठान, स्तम्भ, द्रव्य- संग्रह, प्रस्तरकरण, सन्धिकर्म, कलश, छत एवं शिखर आदि का निरूपण किया गया है। देवालय, राजभवन-मर्यादा, गोपुर, मण्डप, सभागृह, शालगृह, अलिन्द्र, आंगन आदि वास्तु के अंग हैं। इनका भी विवेचन ग्रन्थ में प्राप्त होता है। भवन की सम्पूर्णता यान-शयनादि उपस्करों के विना पूर्ण नहीं होती; अतः ग्रन्थकार ने इन्हें भी वास्तु का वर्ण्य विषय बनाया है। इसी प्रकार प्रासाद की परिकल्पना देवविग्रह से रहित अकल्पनीय होती है। अतः ग्रन्थकार ने सकल ( प्रतिमा ), निष्कल ( लिङ्ग ) एवं मिश्र ( मुखलिङ्ग ) का लक्षणसहित प्रतिपादन किया है। महादेव शिव के प्रति अनन्य भक्ति होने के कारण ग्रन्थकार ने पौरुष लिङ्ग, स्वयम्भू लिङ्ग, धारालिङ्ग, स्फाटिक लिङ्ग आदि का अत्यन्त विस्तार से वर्णन किया है। अन्य देवी-देवताओं का भी विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। इस प्रकार मय ने वास्तुशास्त्र के सभी पक्षों पर प्रकाश डाला है। ग्रन्थ पर शैव मत का प्रभाव मयमत ग्रन्थ पर शैव मत का अत्यधिक प्रभाव परिलक्षित होता है। प्रो० कपिला वात्स्यायन ( मयमतम् ग्रन्थ की भूमिका, ब्रूनो डेगेन्स द्वारा सम्पादित ) ने इस पर कामिकागम, मुख्यतः पूर्व कामिकागम का प्रभाव माना है। शैव सिद्धान्त पर आधारित इस ग्रन्थ में शैवागमों का प्रभाव परिलक्षित होता है; तथापि बुद्ध एवं जिन तथा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा का लक्षण एवं वर्णन ग्रन्थकार के अन्य दार्शनिक धाराओं के प्रति दृष्टिकोण का परिचायक है। ग्रन्थ के प्रकाशन इस ग्रन्थ का सम्भवतः प्रथम प्रकाशन गणपति शास्त्री द्वारा १९११ में अनन्तशयन संस्कृत ग्रन्थावलि के ग्रन्थांक ६५ में हुआ था। वर्तमान समय में यह ग्रन्थ अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण स्थिति में प्राप्त होता है। इसके पश्चात् १९७०-७६ में फ्रेञ्च इन्स्टिट्यूट आफ इन्डोलॉजी ( वर्तमान समय में फ्रेञ्च इन्स्टिट्यूट ) पाण्डिचेरी से प्रकाशित हुआ। १९८५ में सीताराम भारतीय इन्स्टिट्यूट आफ साइन्टिफिक रिसर्च, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात् इन्दिरा गाँधी नेशनल सेण्टर फार द आर्ट्स, नई दिल्ली से कलामूलशास्त्र ग्रन्थमाला-१४ में इस ग्रन्थ का प्रकाशन ब्रूनो डेगेन्स के अंग्रेजी अनुवाद के साथ हुआ। इतने प्रकाशनों के पश्चात् भी हिन्दीभाषी पाठकों के लिये इस ग्रन्थ का अध्ययन दुष्कर ही बना रहा। अतः इस ग्रन्थ को हिन्दी भाषा में भावानुवाद, विशिष्ट व्याख्यात्मक