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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

( १४ ) विन्यास आवश्यक होता है। अतः ग्रन्थ में इनका विवेचन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त ग्राम, नगर, भवन, नींव में गर्भविन्यास, उपपीठ, अधिष्ठान, स्तम्भ, द्रव्य- संग्रह, प्रस्तरकरण, सन्धिकर्म, कलश, छत एवं शिखर आदि का निरूपण किया गया है। देवालय, राजभवन-मर्यादा, गोपुर, मण्डप, सभागृह, शालगृह, अलिन्द्र, आंगन आदि वास्तु के अंग हैं। इनका भी विवेचन ग्रन्थ में प्राप्त होता है। भवन की सम्पूर्णता यान-शयनादि उपस्करों के विना पूर्ण नहीं होती; अतः ग्रन्थकार ने इन्हें भी वास्तु का वर्ण्य विषय बनाया है। इसी प्रकार प्रासाद की परिकल्पना देवविग्रह से रहित अकल्पनीय होती है। अतः ग्रन्थकार ने सकल ( प्रतिमा ), निष्कल ( लिङ्ग ) एवं मिश्र ( मुखलिङ्ग ) का लक्षणसहित प्रतिपादन किया है। महादेव शिव के प्रति अनन्य भक्ति होने के कारण ग्रन्थकार ने पौरुष लिङ्ग, स्वयम्भू लिङ्ग, धारालिङ्ग, स्फाटिक लिङ्ग आदि का अत्यन्त विस्तार से वर्णन किया है। अन्य देवी-देवताओं का भी विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। इस प्रकार मय ने वास्तुशास्त्र के सभी पक्षों पर प्रकाश डाला है। ग्रन्थ पर शैव मत का प्रभाव मयमत ग्रन्थ पर शैव मत का अत्यधिक प्रभाव परिलक्षित होता है। प्रो० कपिला वात्स्यायन ( मयमतम् ग्रन्थ की भूमिका, ब्रूनो डेगेन्स द्वारा सम्पादित ) ने इस पर कामिकागम, मुख्यतः पूर्व कामिकागम का प्रभाव माना है। शैव सिद्धान्त पर आधारित इस ग्रन्थ में शैवागमों का प्रभाव परिलक्षित होता है; तथापि बुद्ध एवं जिन तथा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा का लक्षण एवं वर्णन ग्रन्थकार के अन्य दार्शनिक धाराओं के प्रति दृष्टिकोण का परिचायक है। ग्रन्थ के प्रकाशन इस ग्रन्थ का सम्भवतः प्रथम प्रकाशन गणपति शास्त्री द्वारा १९११ में अनन्तशयन संस्कृत ग्रन्थावलि के ग्रन्थांक ६५ में हुआ था। वर्तमान समय में यह ग्रन्थ अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण स्थिति में प्राप्त होता है। इसके पश्चात् १९७०-७६ में फ्रेञ्च इन्स्टिट्यूट आफ इन्डोलॉजी ( वर्तमान समय में फ्रेञ्च इन्स्टिट्यूट ) पाण्डिचेरी से प्रकाशित हुआ। १९८५ में सीताराम भारतीय इन्स्टिट्यूट आफ साइन्टिफिक रिसर्च, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात् इन्दिरा गाँधी नेशनल सेण्टर फार द आर्ट्स, नई दिल्ली से कलामूलशास्त्र ग्रन्थमाला-१४ में इस ग्रन्थ का प्रकाशन ब्रूनो डेगेन्स के अंग्रेजी अनुवाद के साथ हुआ। इतने प्रकाशनों के पश्चात् भी हिन्दीभाषी पाठकों के लिये इस ग्रन्थ का अध्ययन दुष्कर ही बना रहा। अतः इस ग्रन्थ को हिन्दी भाषा में भावानुवाद, विशिष्ट व्याख्यात्मक

( १५ ) टिप्पणी, पारिभाषिक शब्दावली एवं विषय को समझने में सहायक चित्रावली के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है। कृतवेदिता पुष्पाञ्जलि मेरी प्रथम पुष्पाञ्जलि पराम्बा-सहित भगवान् शिव के चरणों में समर्पित है, जिनकी कृपा के बिना यह कार्य सम्भव नहीं था। मयमत ग्रन्थ के कर्ता दैत्यराज मय तथा सभी पूर्व सूरियों को मैं नमन करती हूँ, जिनके आशीर्वाद से एवं ग्रन्थों के अव- लोकन से मैं इस ग्रन्थ की ग्रन्थियों को सुलझा सकी। इस कार्य की योजना उपस्थित करने वाले तथा भरपूर सामग्री सुलभ कराने वाले चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन परिवार के श्री नवनीतदास जी गुप्त जी मेरी कृतज्ञता के अत्यधिक पात्र हैं। विषय-विशेषज्ञ न होते हुये भी मेरे शैक्षणिक कार्य में अत्यधिक रुचि रखते हुये हर कदम पर उत्साहित करने वाले अपने पति डॉ. राधेकृष्ण पाण्डेय की मैं अत्यधिक आभारी हूँ, जिनके द्वारा प्रदत्त पूर्ण सहयोग एवं मनोबल के कारण मैं इस कार्य को हर बाधा पार करते हुये पूर्ण कर सकी। गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ ( अधुना गंगानाथ झा परिसर ), इलाहाबाद के ग्रन्थालय का मैंने इस कार्य में भरपूर प्रयोग किया है; अतः मैं सम्पूर्ण लाइब्रेरी- परिवार को धन्यवाद देती हूँ। अन्ततः चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी की मैं कृतज्ञ हूँ, जिन्होंने अत्यल्प समय में इस ग्रन्थ को सुन्दर कलेवर में प्रकाशित करने का भार उठाया। मानवीय दुर्बलताओं के कारण इस ग्रन्थ में हुई त्रुटियों के लिये सभी सुधिजनों से क्षमा-प्रार्थना करती हुई— विदुषां वशंवदा शैलजा पाण्डेय

विषयानुक्रमणी विषयाः पृष्ठाङ्काः प्रथमोऽध्यायः (संग्रहाध्यायः ) ◆ मङ्गलाचरणम् १ ◆ ग्रन्थविषयसूचना १ ◆ ग्रन्थप्रामाण्यकथनम् ३ द्वितीयोऽध्यायः (वस्तुप्रकारः ) ◆ वस्तुभेदाः ४ ◆ भूमिभेदाः ४ ◆ भूप्राधान्ये हेतुः ५ ◆ वर्णानुरूपा भूमिः ५ तृतीयोऽध्यायः (भूपरीक्षा ) ◆ अनिन्द्या भूः ८ ◆ निन्द्या भूः ९ ◆ सर्वोत्कृष्टा भूः ११ चतुर्थोऽध्यायः (भूपरिग्रहः ) ◆ भूग्रहणे कर्तव्यानि १५ ◆ उत्तमादिभूलक्षणम् १७ पञ्चमोऽध्यायः (मानोपकरणम् ) ◆ शिल्पिलक्षणम् २१ विषयाः पृष्ठाङ्काः ◆ स्थपतिः २१ ◆ सूत्रग्राही २२ ◆ तक्षकः २२ ◆ वर्धकिः २२ षष्ठोऽध्यायः (दिक्परिच्छेदः ) ◆ शङ्कुलक्षणम् २९ ◆ अपच्छाया ३१ ◆ रज्जुलक्षणम् ३१ ◆ खातशङ्कुलक्षणम् ३२ ◆ सूत्रविन्यासम् ३२ ◆ पुनरपच्छाया ३४ सप्तमोऽध्यायः (पदविन्यासः ) ◆ द्वात्रिंशत् पदानि ३६ ◆ सकलम् ३८ ◆ पेचकम् ३९ ◆ पीठम् ३९ ◆ महापीठम् ३९ ◆ उपपीठादि ४० ◆ दैवतस्थानानि ४१ ◆ मण्डूकपदम् ४२ ◆ वास्तुपुरुषविधानम् ४३ ◆ पुनर्मण्डूकपदम् ४४ ◆ परमशायिपदम् ४५

( १७ ) विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः अष्टमोऽध्यायः | द्वादशोऽध्यायः ( बलिकर्म ) | ( गर्भविन्यासः ) ✦ आहत्यबलिः ४८ | ✦ फेला १०२ ✦ साधारणबलिः ५० | ✦ गर्भस्थापनम् १०३ ✦ पुनर्मानोपकरणम् ५२ | ✦ शिवगर्भम् १०६ ✦ ग्रामादिमानम् ५२ | ✦ विष्णुगर्भम् १०८ ✦ आयादि ५४ | ✦ ब्रह्मगर्भम् १०८ ✦ विप्रसंख्या ५६ | ✦ षण्मुखगर्भम् १०८ ✦ ग्रामनामानि ५७ | ✦ मानुषहर्म्यगर्भकम् १११ ✦ वीथिविधानम् ५७ | ✦ गर्भमन्त्रः ११६ ✦ ग्रामभेदाः ५८ | ✦ वाप्यादिगर्भः ११६ ✦ द्वाराणि ६१ | ✦ प्रथमेष्टका ११६ ✦ प्रासादस्थानम् ६२ | त्रयोदशोऽध्यायः ✦ दौवारिकाः ६५ | ( उपपीठविधानम् ) ✦ वर्ज्यस्थानानि ६५ | ✦ वेदिभद्रम् १२१ ✦ श्रेणिस्थानम् ६५ | ✦ प्रतिभद्रम् १२१ ✦ गृहलक्षणम् ६६ | ✦ सुभद्रम् १२२ ✦ विन्यासदोषाः ६७ | चतुर्दशोऽध्यायः ✦ गर्भविन्यासः ६८ | ( अधिष्ठानविधानम् ) दशमोऽध्यायः | ✦ अधिष्ठानवस्तुनिर्माणम् १२५ ( नगरविधानम् ) | ✦ अधिष्ठानोन्मानम् १२६ ✦ नगरमानम् ७४ | ✦ पादबन्धम् १२८ ✦ वप्रविधानम् ७६ | ✦ उरगबन्धम् १२८ ✦ वर्ज्यस्थानानि ७६ | ✦ प्रतिक्रमम् १२८ ✦ मार्गाः ७६ | ✦ पद्मकेसरम् १२९ ✦ राजधानी ७७ | ✦ पुष्पपुष्कलम् १२९ ✦ खेटादिभेदाः ७८ | ✦ श्रीबन्धम् १३० ✦ दुर्गाणि ८० | ✦ मञ्चबन्धम् १३० ✦ नगरविन्यासः ८२ | ✦ श्रीकान्तम् १३१ ✦ अन्तरापणम् ८६ | ✦ श्रेणीबन्धम् १३१

( १८ ) विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ पद्मबन्धम् १३१ ✦ वप्रबन्धम् १३१ ✦ कपोतबन्धम् १३२ ✦ प्रतिबन्धम् १३२ ✦ कलशाधिष्ठानम् १३२ ✦ अधिष्ठानसामान्यलक्षणम् १३२ ✦ अधिष्ठानपर्यायनामानि १३३ ✦ निर्गममानम् १३३ ✦ अधिष्ठानप्रतिच्छेदविधिः १३४ पञ्चदशोऽध्यायः ( पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् ) ✦ स्तम्भलक्षणम् १३८ ✦ स्तम्भमानम् १३८ ✦ स्तम्भभेदाः १३९ ✦ दण्डलक्षणम् १४२ ✦ कलशलक्षणम् १४२ ✦ पोतिका १४४ ✦ स्तम्भविषये विशेषः १४५ ✦ द्रव्यपरिग्रहः १४७ ✦ वृक्षलक्षणम् १४७ ✦ शिलालक्षणम् १४८ ✦ इष्टकालक्षणम् १४८ ✦ वर्ज्याः वृक्षाः १४९ ✦ वृक्षसंग्रहणम् १५१ ✦ मुहूर्तस्तम्भः १५४ ✦ इष्टकासंग्रहणम् १५६ षोडशोऽध्यायः ( प्रस्तरकरणम् ) ✦ उत्तरवाजनौ १६५ ✦ प्रमालिका १६६ विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ दण्डिका १६६ ✦ वलयं गोपानञ्च १६६ ✦ कायपादम् १६७ ✦ वाजनम् १६८ ✦ कपोतम् १६८ ✦ प्रस्तरोर्ध्वभागम् १६९ ✦ तुलादिबन्धम् १७० ✦ प्रस्तरमानम् १७२ ✦ लेपः १७३ ✦ युग्मायुग्ममानम् १७३ ✦ द्वारम् १७३ ✦ वेदिः १७३ ✦ जालकानि १७४ ✦ भित्तिः १७५ सप्तदशोऽध्यायः ( सन्धिकर्मविधानम् ) ✦ सन्धिभेदाः १८१ ✦ संन्धिविधिः १८१ ✦ मल्ललीलादिसन्धयः १८२ ✦ सर्वतोभद्रसन्धिः १८३ ✦ नन्द्यावर्तसन्धिः १८४ ✦ स्वस्तिबन्धसन्धिः १८४ ✦ वर्धमानसन्धिः १८४ ✦ सन्धिभेदाः १८५ ✦ स्तम्भसन्धयः १८६ ✦ शयितसन्धयः १८७ ✦ विद्धं कीलं च १८८ ✦ सन्धिदोषाः १८८ अष्टादशोऽध्यायः ( प्रासादोर्ध्ववर्गाः ) ✦ गललक्षणम् १९३

१. अध्याय १-७: वास्तु-परिभाषा, भूमि-लक्षण, शङ्कु-स्थापन एवं ग्राम-नगर विन्यास

( १९ ) विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ शिखरभेदाः १९४ | ✦ दक्षिणादानम् २२४ ✦ शिखराकृतिः १९५ | ✦ सम्प्रोक्षणावश्यकता २२४ ✦ स्तूपिकोत्सेधः १९५ | ✦ सम्प्रोक्षणकालः २२५ ✦ लुपासंख्या १९६ | ✦ कलशस्थापनम् २२६ ✦ पुष्करम् १९६ | एकोनविंशोऽध्यायः ✦ लुपामानम् १९६ | ( एकभूमिविधानम् ) ✦ पञ्जरलुपाभेदाः १९८ | ✦ मुखमण्डपम् २३१ ✦ शिखरावयवमानानि १९९ | ✦ धामपर्यायनामानि २३२ ✦ छादनम् २०० | ✦ गर्भगृहमानम् २३३ ✦ वलयसन्धिः २०० | ✦ स्तूपिकामानम् २३३ ✦ घटिका २०१ | ✦ द्वारम् २३४ ✦ पुनश्छादनम् २०३ | ✦ नालमानम् २३५ ✦ स्तूपिकाकीलम् २०३ | ✦ अलङ्करणम् २३६ ✦ ललाटभूषणम् २०५ | ✦ धामभेदाः २३६ ✦ स्तूपिका २०५ | ✦ विमानतलदेवता २३७ ✦ लेपः सुधाकर्म च २०७ | विंशोऽध्यायः ✦ चित्रकर्म २०९ | ( द्विभूमिविधानम् ) ✦ मूर्ध्नष्टका २१० | ✦ स्वस्तिकम् २४० ✦ स्तूपिकाकीलम् २११ | ✦ विपुलसुन्दरम् २४१ ✦ मूर्ध्नष्टकादिस्थापनम् २१२ | ✦ कूटलक्षणम् २४१ ✦ दक्षिणादानम् २१६ | ✦ कैलासादि २४२ ✦ रत्नादिस्थानम् २१६ | ✦ पुनः धामभेदाः २४४ ✦ कर्मसमाप्तिः २१७ | ✦ खण्डभवनम् २४५ ✦ स्तूपिकीलवृक्षाः २१८ | ✦ तोरणम् २४५ ✦ सम्प्रोक्षणकर्म २१८ | एकविंशोऽध्यायः ✦ अधिवासमण्डपः २१८ | ( त्रिभूमिविधानम् ) ✦ कुम्भस्थापनम् २२० | ✦ स्वस्तिकम् २४८ ✦ वास्तुदेवताबलिः २२१ | ✦ विमलाकृतिकम् २४९ ✦ चक्षुर्मोक्षणम् २२१ | ✦ हस्तिपृष्ठम् २५० ✦ सम्प्रोक्षणम् २२२ | ✦ स्तूपिकुम्भः २२२ |

( २० ) विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ मुखमण्डपम् २५१ ✦ पुनः हस्तिपृष्ठम् २५२ ✦ स्तम्भतोरणम् २५२ ✦ पुनः हस्तिपृष्ठम् २५३ ✦ भद्रकोष्ठम् २५४ ✦ वृत्तकूटम् २५६ ✦ सुमङ्गलम् २५६ ✦ गान्धारम् २५६ ✦ श्रीभोगम् २५७ ✦ कूटकोष्ठादि २५८ ✦ पुनः धामभेदाः २५८ ✦ नालीगृहम् २५८ ✦ वेदिका २५९ ✦ तोरणादिविधानम् २५९ ✦ सोपानम् २६२ द्वाविंशोऽध्यायः ( चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् ) ✦ सुभद्रकम् २६७ ✦ श्रीविशालम् २६९ ✦ भद्रकोष्ठम् २६९ ✦ जयावहम् २७० ✦ भद्रकूटम् २७२ ✦ कपोतपञ्जरम् २७२ ✦ पुनः भद्रकूटम् २७३ ✦ मनोहरम् २७३ ✦ आवन्तिकम् २७४ ✦ सुखावहम् २७४ ✦ पञ्चभूमिविधानम् २७५ ✦ षडाद्येकादशभूम्यन्तविधानम् २७६ ✦ द्वादशतलविधानम् २७७ विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ खण्डहर्म्यम् २७८ ✦ कूटकोष्ठादि २७९ त्रयोविंशोऽध्यायः ( प्राकारपरिवारविधानम् ) ✦ तत्र प्राकारविधानम् २८३ ✦ प्राकारमानम् २८३ ✦ प्राकारभित्तिः २८५ ✦ आवृतमण्डपम् २८६ ✦ सालशीर्षालङ्कारः २८७ ✦ अधिष्ठानोत्सेधः २८८ ✦ परिवारालयविधानम् २८८ ✦ अष्टौ परिवाराः २८९ ✦ द्वादश परिवाराः २८९ ✦ षोडश परिवाराः २८९ ✦ द्वात्रिंशत् परिवाराः २९० ✦ मालिकापङ्क्तिः २९१ ✦ पीठलक्षणम् २९३ ✦ ध्वजस्थानम् २९५ ✦ प्राकाराश्रितस्थानानि २९५ ✦ शक्तिस्तम्भः २९६ ✦ इतरस्थानानि २९६ ✦ विष्णुपरिवारकम् २९७ ✦ वृषलक्षणम् २९८ चतुर्विंशोऽध्यायः ( गोपुरविधानम् ) ✦ पञ्चविधगोपुरमानम् ३०५ ✦ पञ्चविधगोपुरम् ३०६ ✦ द्वारमानम् ३०८ ✦ गोपुरभेदाः ३०९ ✦ एकतलगोपुरम् ३१०

( २१ ) विषया: पृष्ठाङ्का: | विषया: पृष्ठाङ्का: ✦ द्वितलगोपुरम् ३१० | ✦ भक्तिमानम् ३३० ✦ त्रितलगोपुरम् ३११ | ✦ स्तम्भमानम् ३३० ✦ चतुस्तलगोपुरम् ३११ | ✦ अधिष्ठानोत्सेध: ३३१ ✦ पञ्चतलगोपुरम् ३१२ | ✦ उपपीठोत्सेध: ३३१ ✦ षट्‌तलगोपुरम् ३१२ | ✦ मण्डपलक्षणम् ३३१ ✦ सप्ततलगोपुरम् ३१३ | ✦ मण्डपशब्दार्थ: ३३२ ✦ गोपुरविस्तारमानम् ३१३ | ✦ प्रपालक्षणम् ३३२ ✦ द्वारविस्तारमानम् ३१६ | ✦ रङ्गलक्षणम् ३३२ ✦ गोपुरालङ्कार: ३१७ | ✦ मालिकामण्डपम् ३३३ ✦ श्रीकर-द्वारशोभा ३१७ | ✦ मेरुकम् ३३३ ✦ रतिकान्त-द्वारशोभा ३१८ | ✦ विजयम् ३३४ ✦ कान्तविजय-द्वारशोभा ३१८ | ✦ सिद्धम् ३३४ ✦ विजयविशाल-द्वारशाला ३१९ | ✦ यागमण्डपम् ३३४ ✦ विशालालय-द्वारशाला ३१९ | ✦ कुण्डलक्षणम् ३३५ ✦ विप्रतीकान्त-द्वारशाला ३२० | ✦ योनिकुण्डम् ३३५ ✦ श्रीकान्त-द्वारप्रासाद: ३२० | ✦ अर्धचन्द्रकुण्डम् ३३६ ✦ श्रीकेश-द्वारप्रासाद: ३२१ | ✦ त्र्यस्रकुण्डम् ३३६ ✦ केशविशाल-द्वारप्रासाद: ३२१ | ✦ वृत्तकुण्डम् ३३६ ✦ स्वस्तिक-द्वारहर्म्यम् ३२२ | ✦ षट्‌कोणकुण्डम् ३३६ ✦ दिशास्वस्तिक-द्वारहर्म्यम् ३२२ | ✦ पद्मकुण्डम् ३३७ ✦ मर्दल-द्वारहर्म्यम् ३२३ | ✦ अष्टास्रकुण्डम् ३३७ ✦ मात्राकाण्ड-द्वारगोपुरम् ३२३ | ✦ सप्तास्रकुण्डम् ३३७ ✦ श्रीविशाल-द्वारगोपुरम् ३२४ | ✦ पञ्चास्रकुण्डम् ३३८ ✦ चतुर्मुख-द्वारगोपुरम् ३२४ | ✦ सिद्धम् ३३८ पञ्चविंशोऽध्याय: | ✦ पद्मकम् ३३९ ( मण्डपसभाविधानम् ) | ✦ भद्रकम् ३४० | ✦ शिवम् ३४० ✦ मण्डपविधानम् ३२८ | ✦ वेदम् ३४१ ✦ मण्डपयोग्यादेशा: ३२८ | ✦ अलङ्कृतम् ३४१ ✦ मण्डपप्रयोजनम् ३२८ | ✦ दर्भम् ३४२ ✦ मण्डपनामानि ३२९ | ✦ कौशिकम् ३४२

( २२ ) विषयाः पृष्ठाङ्काः विषयाः पृष्ठाङ्काः ✦ कुलधारणम् ३४३ ✦ कूटलक्षणम् ३६१ ✦ सुखाङ्गम् ३४३ ✦ मल्लवसन्तम् ३६१ ✦ सौम्यम् ३४४ ✦ पञ्चवसन्तकम् ३६१ ✦ गर्भम् ३४५ ✦ एकवसन्तकम् ३६२ ✦ माल्यम् ३४५ ✦ सर्वतोभद्रम् ३६२ ✦ माल्याद्भुतम् ३४६ ✦ पार्वतकूर्मकम् ३६२ ✦ धनम् ३४७ ✦ माहेन्द्रम् ३६३ ✦ सुभूषणम् ३४७ ✦ सोमवृत्तम् ३६३ ✦ आहल्यम् ३४८ ✦ शुकविमानम् ३६४ ✦ स्रुगाख्यम् ३४८ ✦ श्रीप्रतिष्ठितम् ३६४ ✦ कोणम् ३४८ ✦ खर्वटम् ३४९ ✦ श्रीरूपम् ३४९ ✦ मङ्गलम् ३५० ✦ मार्गम् ३५१ ✦ सौभद्रम् ३५१ ✦ सुन्दरम् ३५२ ✦ साधारणम् ३५२ ✦ सौख्यम् ३५३ ✦ ईश्वरकान्तम् ३५३ ✦ श्रीभद्रम् ३५४ ✦ सर्वतोभद्रम् ३५४ ✦ मण्डपमुखायामः ३५५ ✦ पुनः मण्डपभेदाः ३५६ ✦ जलक्रीडामण्डपम् ३५६ ✦ मण्डपयोग्यवृक्षाः ३५७ ✦ मुखमण्डपानि ३५८ ✦ मण्डपगर्भस्थानम् ३५९ ✦ अलिन्द्रम् ३५९ ✦ मालिका ३५९ ✦ तत्र सभाभेदाः ३६०

॥ श्रीः॥ दानवराजमयप्रणीतं मयमतम् शिवार्पिताहिन्दीव्याख्योपेतम् M.Katyayana अथ प्रथमोऽध्यायः ( संग्रहाध्यायः ) ❋ मङ्गलाचरणम् ❋ प्रणम्य शिरसा देवं सर्वज्ञं जगदीश्वरम्। तं पृष्ट्वास्मादलं श्रुत्वा शास्ति शास्त्रं यथाक्रमम् ॥१॥ सर्वस्व के ज्ञाता, संसार के स्वामी देवता को सिर झुका कर प्रणाम करने के पश्चात् मैं ( मय ) ने उनसे ( वास्तुशास्त्र से सम्बन्धित ) प्रश्न किया एवं उनसे पर्याप्त शास्त्र-श्रवण करने के पश्चात् क्रमानुसार उस शास्त्र का उपदेश करता हूँ।।१।। तैतिलानां मनुष्याणां वस्त्वादीनां सुखोदयम्। प्राज्ञो मुनिर्मयः कर्त्ता सर्वेषां वस्तुलक्षणम् ॥२॥ देवों एवं मनुष्यों के सभी प्रकार के वास्तु आदि ( भूमि, भवन एवं उपस्कर आदि ) के विद्वान् स्थपति मय मुनि सुख प्रदान करने वाले सभी प्रकार के वास्तु के लक्षण का उपदेश करते हैं।।२।। ❋ ग्रन्थविषयसूचना ❋ आदौ वस्तुप्रकारं च भूपरीक्षापरिग्रहम्। मानोपकरणं चैव शङ्कुस्थापनमार्गकम् ॥३॥ वास्तुकार्य के प्रारम्भिक चरण में प्रथमतः ध्यातव्य तथ्य है—सर्वप्रथम भूमि एवं भवन के प्रकार ( भेदों ) का ज्ञान, तत्पश्चात् भूमि के गुण-दोषों की परीक्षा। उपयुक्त

with , and right next to it is a vertical line! Then comes नां (a with a vertical line and a dot)! Wait, look at सद्मानां: Wait, does it say सद्मानां? Let's look at सद्मानां vs सद्मनां: Wait, look at the character after द्: Is it ? Wait, look at the bottom: it has a loop of . And then a vertical stroke. Then another letter: नां. Wait, or is it सद्मनां? Either सद्मानां or सद्मनां. Let's look at the width: "सद्मानां" has about the same width as "स्तम्भानां" in line 15. In line 15: स्तम्भानां has 4 glyphs (स्त, म्भा, नां). In line 24: the first word has , द्, , , , ... it takes almost the same space! Wait, look at the length of सद्मानां vs परिवाराणां: परिवाराणां has 5 letters. The first word has 3 letters. It looks like सद्मानां! Wait, let's search if `सद्मानां

प्रथमोऽध्यायः 卐 संग्रहाध्यायः ३ यानानां शयनानां च लक्षणं लिङ्गलक्षणम् । पीठस्य लक्षणं सम्यगनुकर्मविधिं तथा ॥१०॥ तदनन्तर यान के लक्षण, शयन के लक्षण, लिङ्ग ( देवलिङ्ग ) एवं उनके पीठ के लक्षण एवं उसके अनुरूप उचित कर्म की विधि वर्णित है।।१०।। प्रतिमालक्षणं देवदेवीनां मानलक्षणम्। चक्षुरुन्मीलनं चैव संक्षिप्याह यथाक्रमम् ॥११॥ देवालय के प्रसङ्ग में मूर्ति के लक्षण, देवता एवं देवियों के प्रमाण का लक्षण, नेत्रों के उन्मीलन की विधि क्रमानुसार संक्षेप में वर्णित है।।११।। ✵ ग्रन्थप्रामाण्यकथनम् ✵ पितामहाद्यैरमरैर्मुनीश्वरै- र्यथा यथोक्तं सकलं मयेन तत्। तथा तथोक्तं सुधियां दिवौकसां नृणां च युक्त्याखिलवस्तुलक्षणम् ॥१२॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे संग्रहाध्यायः प्रथमः ब्रंह्मा आदि देवों ने एवं श्रेष्ठ मुनियों ने जिस प्रकार विद्वानों, देवों एवं मनुष्यों के सम्पूर्ण भवनलक्षणों का उपदेश किया है, उसी प्रकार मय ऋषि ने उन सभी लक्षणों का वर्णन प्रस्तुत किया है।।१२।।

अथ द्वितीयोऽध्यायः ( वस्तुप्रकारः ) ✹ वस्तुभेदाः ✹ अमर्त्याश्चैव मर्त्याश्च यत्र यत्र वसन्ति हि। तद् वस्त्विति मतं तज्ज्ञैस्तद्भेदं च वदाम्यहम् ॥१॥ आवास एवं भूमि के प्रकार—अमर ( देव ) एवं मरणधर्मा ( मनुष्य ) जहाँ- जहाँ निवास करते हैं, विद्वज्जन उसे वस्तु ( वास्तु ) कहते हैं। उन निवासस्थलों के भेदों का मैं ( मय ऋषि ) वर्णन करता हूँ॥१॥ भूमिप्रासादयानानि शयनं च चतुर्विधम्। भूरेव मुख्यवस्तु स्यात्तत्र जातानि यानि हि ॥२॥ वास्तु चार प्रकार के होते हैं—भूमि, प्रासाद ( देवालय ), यान एवं शयन। इनमें प्रधान वास्तु भूमि ही है; क्योंकि शेष इसी से उत्पन्न होते हैं॥२॥ प्रासादादीनि वास्तूनि वस्तुत्वाद् वस्तुसंश्रयात्। वस्तून्येव हि तान्येव प्रोक्तान्यस्मिन् पुरातनैः ॥३॥ प्रासाद आदि वास्तु प्रधान वस्तु ( वास्तु ) भूमि से उत्पन्न होने एवं उस पर आश्रित होने के कारण वास्तु ही हैं। इसी कारण प्राचीन आचार्यों ने इन्हें वास्तु की संज्ञा प्रदान की है॥३॥ वर्णगन्धरसाकारदिक्शब्दस्पर्शनैरपि । परीक्ष्यैव यथायोग्यं गृहीतावधिनिश्चिता ॥४॥ ( चारो वास्तुओं में प्रथमतः प्रधान वास्तु पर विचार करना चाहिये। ) भवन- प्रासादादि के निर्माण के लिये भूमि की परीक्षा वर्ण ( रंग ), गन्ध, रस ( स्वाद ), आकृति, दिशा, शब्द एवं स्पर्श के द्वारा करनी चाहिये। परीक्षा के पश्चात् ही निर्माण- कार्य की आवश्यकता के अनुसार भूमि-ग्रहण करना चाहिये॥४॥ ✹ भूमिभेदाः ✹ या सा भूमिरिति ख्याता वर्णानां च विशेषतः। द्विविधं तत् समुद्दिष्टं गौणमङ्गीत्यनुक्रमात् ॥५॥

द्वितीयोऽध्यायः 卐 वस्तुप्रकारः ५ प्रत्येक वर्ण ( ब्राह्मणादि ) के अनुसार भूमि का वर्णन किया गया है। इस दृष्टि से भूमि क्रमशः दो प्रकार की होती है—गौण एवं अङ्गी ( प्रधान ) ॥५॥ ग्रामादीन्येव गौणानि भवन्त्यङ्गी मही मता। सभा शाला प्रपा रङ्गमण्डपं मन्दिरं तथा ॥६॥ भूमि अङ्गी होती है तथा ग्रामादि गौण के अन्तर्गत आते हैं। सभागार, शाला, प्रपा ( प्याऊ ), रङ्गमण्डप एवं मन्दिर ( प्रासाद होते हैं ) ॥६॥ प्रासाद इति विख्यातं शिबिका गिल्लिका रथम्। स्यन्दनं चैवमानीकं यानमित्युच्यते बुधैः ॥७॥ इन्हें प्रासाद कहते हैं। शिबिका, गिल्लिका, रथ, स्यन्दन एवं आनीक को यान कहा जाता है॥७॥ मञ्चं मञ्चिलिका काष्ठं पञ्जरं फलकासनम्। पर्यङ्कं बालपर्यङ्कं शयनं चैवमादिकम् ॥८॥ शयन के अन्तर्गत मञ्च ( सिंहासन ), मञ्चिलिका ( दीवान ), काष्ठ ( काठ के आसन ), पञ्जर ( पिंजरा ), फलकासन ( बेञ्च ), पर्यङ्क ( पलंग ), बालपर्यङ्क आदि ग्रहण किये जाते हैं॥८॥ ☀ भूप्राधान्ये हेतुः ☀ चतुर्णामधिकाराणां भूरेवादौ प्रवक्ष्यते। भूतानामादिभूतत्वादाधारत्वाज्जगत्स्थितेः ॥९॥ उपर्युक्त चारो में प्रथम स्थान भूमि का कहा जाता है; क्योंकि भूतों ( पञ्च महा- भूतों ) में प्रथम स्थान भूमि का है, संसार की स्थिति इसी पर है एवं यही सबका आधार है॥९॥ ☀ वर्णानुरूपा भूमिः ☀ चतुरस्रं द्विजातीनां वस्तु श्वेतमनिन्दितम्। उदुम्बरद्रुमोपेतमुत्तरप्रवणं वरम् ॥१०॥ ब्राह्मणों के लिये प्रशस्त भूमि के लक्षण इस प्रकार हैं—भूमि चौकोर ( लम्बाई- चौड़ाई का प्रमाण सम ) हो, मिट्टी का रंग श्वेत हो, उदुम्बर के वृक्ष से ( गूलर ) युक्त हो एवं भूमि का ढलान उत्तर दिशा की ओर रहे॥१०॥ कषायमधुरं सम्यक् कथितं तत् सुखप्रदम्। व्यासाष्टांशाधिकायामं रक्तं तिक्तरसान्वितम् ॥११॥

६ मयमतम् कषाय-मधुर स्वाद वाली भूमि ( ब्राह्मणों के लिये ) सुखद कही गयी है। क्षत्रियों के लिये श्रेष्ठ भूमि के लक्षण इस प्रकार हैं—भूमि लम्बाई में चौड़ाई से आठ भाग अधिक हो, मिट्टी का रंग लाल हो एवं स्वाद में तिक्त हो।। ११।। प्राङ्निम्नं तत् प्रविस्तीर्णमश्वत्थद्रुमसंयुतम्। प्रशस्तं भूभृतां वस्तु सर्वसम्पत्करं सदा ॥१२॥ पूर्व की ओर ढलान वाली, विस्तृत, पीपल के वृक्ष से समन्वित भूमि राजाओं ( क्षत्रियों ) के लिये शुभ एवं सर्वदा सभी प्रकार की सम्पत्ति प्रदान करने वाली कही गई है।। १२।। षडंशेनाधिकायामं पीतमम्लरसान्वितम्। प्लक्षद्रुमयुतं पूर्वावनतं शुभदं विशाम् ॥१३॥ लम्बाई चौड़ाई से छः भाग अधिक हो, मिट्टी का रंग पीला हो, उसका स्वाद खट्टा हो, प्लक्ष ( पाकड़ ) के वृक्ष से युक्त हो एवं पूर्व दिशा की ओर ढलान हो—ऐसी भूमि वैश्य वर्ण के लिये प्रशस्त कही गई है।।१३।। चतुरंशाधिकायामं वस्तु प्राक्प्रवणान्वितम्। कृष्णं तत् कटुकरसं न्यग्रोधद्रुमसंयुतम्। प्रशस्तं शूद्रजातीनां धनधान्यसमृद्धिदम् ॥१४॥ लम्बाई चौड़ाई से चार भाग अधिक हो, पूर्व दिशा की ओर ढलान हो, मिट्टी का रंग काला हो तथा स्वाद कड़वा हो, भूमि पर बरगद के वृक्ष हों। इस प्रकार की भूमि शूद्र वर्ण वालों को धन-धान्य एवं समृद्धि प्रदान करती है।।१४।। एवं प्रोक्तो वस्तुभेदो द्विजानां भूपानां वै वैश्यकानां परेषाम्। योग्यं सर्वं भूसुराणां सुराणां भूपानां तच्छेषयोरुक्तनीत्या ॥१५॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे वस्तुप्रकारो नाम द्वितीयोऽध्यायः इस प्रकार ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों एवं शूद्रों के अनुरूप वास्तु ( भूमि ) के प्रकार का वर्णन किया गया है। देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के लिये सभी प्रकार की भूमियाँ प्रशस्त होती हैं ( यह उपर्युक्त मत का विकल्प है ); किन्तु शेष दो ( वैश्य एवं शूद्र ) को अपने अनुरूप भूमि का ही चयन करना चाहिये।। १५।।

द्वितीयोऽध्यायः 卐 वस्तुप्रकारः ७ व्याख्यात्मक टिप्पणी वास्तु के प्रकार ( श्लोक-१-३ ) वास्तु के अन्तर्गत जिन विषयों का अध्ययन अभिप्रेत है, उनका उल्लेख अन्य वास्तुग्रन्थों में भी प्राप्त होता है। उनमें से कुछ उल्लेखनीय प्रसङ्ग इस प्रकार हैं— (क) मानसार के अनुसार पृथिवी, भवन, यान एवं पर्यङ्क ( आसन ) वस्तु अथवा वास्तु हैं— तैतिलाश्र नराश्चैव यस्मिन्यस्मिन् परिस्थिताः। तद्वस्तु सूरिभिः प्रोक्तं तथा वै वक्ष्यतेऽधुना।। धराहर्म्यादि यानं च पर्यङ्कादि चतुर्विधम्। धरा प्रधानवस्तु स्यात्तत्तज्जातिषु सर्वशः।। ( ३.१-२ ) (ख) समराङ्गणसूत्रधार के अनुसार देश, पुर, निवास, सभा तथा वेश्मासन वास्तु के अन्तर्गत परिगणित हैं— देशः पुरं निवासश्च सभा वेश्मासनानि च। यद्यदीदृशमन्यच्च तत्तच्छ्रेयस्करं मतम्।। वास्तुशास्त्रादृते तस्य न स्याल्लक्षणनिश्चयः। तस्माल्लोकस्य कृपया शास्त्रमेतदुदीर्यते।। ( १.४-५ ) (ग) विश्वकर्मा के अनुसार देवों, मनुष्यों एवं गज आदि पशुओं की निवास-भूमि एवं भवन-निर्माण में प्रयुक्त इष्टका तथा शिला आदि वास्तु पद से अभिहित हैं— देवतानां नराणाञ्च गजगोवाजिनामपि। निवासभूमिशिल्पज्ञैर्वास्तुसंज्ञमितीर्यते ।।१।।


इष्टिका च शिला दारुरयःकीलादयोऽप्यमी। वास्तुकर्मणि चान्यत्र वास्तुसंज्ञमुदीरितम्।।६१।। ( विश्वकर्मवास्तुशास्त्र-७ ) इनके अतिरिक्त ( २.३२-४० ) वास्तु के शिल्पगत भेदों में ग्राम, पुरी, खेट, कर्वट, दुर्ग, प्रासाद, हर्म्य, न्यायशाला, सभा, कोशागार, अन्तःपुर, शस्त्रागार, क्रीडागृह, तोरण, मञ्चिक, अधिष्ठान, उपपीठ, गोपुर, सङ्कीर्णभवन, पताका, पारिभद्रक, चारों वर्णों के गृह, वेदिका, पोतिका, स्तम्भ, मण्डप, विमान एवं प्राकार आदि का वर्णन प्राप्त होता है।

अथ तृतीयोऽध्यायः ( भूपरीक्षा ) ✺ अनिन्द्या भूः ✺ देवानां तु द्विजातीनां चतुरस्रायताः श्रुताः । वस्त्वाकृतिरनिन्द्या सावाक्प्रत्यग्दिक्समुन्नता ॥१॥ देवों एवं ब्राह्मणों के लिये आयताकार भूमि भी प्रशस्त होती है। भूमि की आकृति अनिन्दनीय होनी चाहिये एवं उसे दक्षिण तथा पश्चिम में ऊँची होनी चाहिये ।। १ ।। हयेभवेणुवीणाब्धिदुन्दुभिध्वनिसंयुता । पुन्नागजातिपुष्पाब्जधान्यपाटलगन्धकैः ॥२॥ भूमि अश्व, गज, वेणु, वीणा, समुद्र ( जल ) एवं दुन्दुभि वाद्य की ध्वनि से युक्त होनी चाहिये तथा पुन्नाग ( नागकेसर ), जाति-पुष्प ( चमेली ), कमल, धान्य एवं पाटल ( गुलाब ) के सुगन्ध से सुवासित होनी चाहिये ।। २ ।। पशुगन्धसमा श्रेष्ठा सर्वबीजप्ररोहिणी । एकवर्णा घना स्निग्धा सुखसंस्पर्शनान्विता ॥३॥ पशु के गन्ध के समान एवं जिस पर सभी प्रकार के बीज उगें, ऐसी भूमि श्रेष्ठ होती है। भूमि एक रंग की, सघन, कोमल एवं छूने में सुख प्रदान करने वाली होनी चाहिये ।। ३ ।। बिल्वो निम्बश्च निर्गुण्डी पिण्डितः सप्तपर्णकः । सहकारश्च षड्वृक्षैरारूढा या समस्थला ॥४॥ जिस समतल भूमि पर बेल, नीम, निर्गुण्डी, पिण्डित, सप्तपर्णक ( सप्तच्छद ) एवं सहकार ( आम )—ये छः वृक्ष हों एवं भूमि समतल हो ।।४।। श्वेता रक्ता च पीता च कृष्णा कापोतसन्निभा । तिक्ता च कटुका चैव कषायलवणाम्लका ॥५॥ रंग में श्वेत, लाल, पीली तथा कपोत के समान काली, स्वाद में तिक्त, कड़वी, कसैली, नमकीन, खट्टी—।।५।।

तृतीयोऽध्यायः 卐 भूपरीक्षा ९ मधुरा षड्रसोपेता सर्वसम्पत्करी धरा। प्रदक्षिणोदकवती वर्णगन्धरसैः शुभा ॥६॥ एवं मीठी—इन छः स्वादों वाली भूमि सभी प्रकार की सम्पत्तियाँ प्रदान करती है। रंग, गन्ध एवं स्वाद से युक्त जिस भूमि पर जलधारा का प्रवाह दाहिनी ओर हो, वह भूमि शुभ होती है।।६।। पुरुषाञ्जलिमात्रे तु दृष्टतोया मनोरमा। निष्कपाला निरुपला कृमिवल्मीकवर्जिता ॥७॥ (उत्खनन करने पर) पुरुषाञ्जलि-प्रमाण (पुरुष-प्रमाण) पर जल दिखाई पड़े, मन को अच्छी लगने वाली, कपालास्थि-विहीन, कंकड़-पत्थररहित, कीटों एवं दीमक की बाँबी आदि से विहीन—।।७।। अस्थिवर्ज्या नसुषिरा तनुवालुकसंयुता। अङ्गारैर्वृक्षमूलैश्च शूलैश्चापि पृथग्विधैः ॥८॥ हड्डी आदि से रहित, छिद्ररहित, महीन बालू वाली, जले कोयले, वृक्ष के मूल एवं किसी प्रकार के शूल से रहित—।।८।। पङ्कसङ्करकूपैश्च दारुभिलोष्टकैरपि। शर्कराभिरयुक्ता या भस्माद्यैस्तु तुषैरपि ॥९॥ कीचड़, धूल, कूप, काष्ठ, मिट्टी के ढेले एवं बालू, राख आदि से तथा भूसे से रहित—।।९।। निन्द्या भूः सा शुभा सर्ववर्णानां सर्वसम्पत्करी धरा। दध्याज्यमधुगन्धा च तैलासृग्गन्धिका च या ॥१०॥ भूमि सभी वर्ण वालों के लिये शुभ एवं समृद्धि प्रदान करने वाली होती है। जो भूमि दधि, घृत, मधु (मद्य), तेल तथा रक्त गन्ध वाली होती है (वह भी प्रशस्त होती है) ।।१०।। शवमीनपक्षिगन्धा सा धरा निन्दिता वरैः। सभाचैत्यसमीपस्था नृपमन्दिरसंश्रिता ॥११॥ शव, मछली एवं पक्षी के गन्ध वाली भूमि अग्राह्य होती है। इसी प्रकार सभागार, चैत्य (ग्राम का प्रधान वृक्ष) एवं राजभवन के निकट की भूमि गृहनिर्माण की दृष्टि से त्याज्य होती है।।११।।

१० मयमतम् देवालयसमीपस्था कण्टकिद्रुमसंयुता । वृत्तत्रिकोणविषमा वज्राभा कच्छपोन्नता ॥१२॥ देवालय के निकट, काँटेदार वृक्ष से युक्त, वृत्ताकार, त्रिकोण, विषम ( जिसकी आकृति असमान हो ), वज्र के सदृश ( कई कोण वाली ) तथा कछुये के समान आकृति ( बीच में ऊँची ) वाली भूमि गृहनिर्माण के लिये प्रशस्त नहीं होती है।।१२।। चण्डालावासगच्छाया चर्मकारालयाश्रिता । एकद्वित्रिचतुर्मार्गा तरिताव्यक्तमार्गका ॥१३॥ जिस भूमि पर चाण्डाल ( शव आदि से आजीविका चलाने वाले ) के गृह की छाया पड़े, चर्म द्वारा आजीविका चलाने वाले के गृह के पास, एक, दो, तीन एवं चार मार्गों पर ( एक-दो राजमार्गों, तिराहे एवं चौराहे ) पर स्थित तथा जहाँ ठीक मार्ग न हों, ऐसे स्थान पर गृह-निर्माण प्रशस्त नहीं होता।।१३।। निम्नं यत् पणवाकारं पक्षीव मुरजोपमम् । मत्स्याभं तु चतुष्कोणे महावृक्षसमायुतम् ॥१४॥ मध्य में दबी, पणव ( ढोल के सदृश एक वाद्य ), पक्षी, मुरज ( एक वाद्य ) तथा मछली के समान आकार की भूमि तथा जहाँ चारो कोनों पर महावृक्ष लगे हों, ऐसी भूमि गृहनिर्माण के लिये उचित नहीं होती है।।१४।। चैत्यवृक्षयुतं सालचतुष्कोणसमाश्रितम् । भुजङ्गनिलयं चैव सङ्गाराममेव च ॥१५॥ ग्रामादि के प्रधान वृक्ष, जिसके चारो कोनों पर साल वृक्ष हों, सर्प के आवास के निकट एवं मिश्रित जाति के वृक्षों के बाग के पास की भूमि गृह-निर्माण के लिये अप्रशस्त होती है।।१५।। श्मशानं चाश्रमस्थानं कपिसूकरसन्निभम् । वनोरगनिभं टङ्कं शूर्पोलूखलसन्निभम् ॥१६॥ श्मशान के क्षेत्र, आश्रमस्थान, बन्दर एवं सुअर के आकार की, वनसर्प के सदृश, कुठार की आकृति वाली, शूर्प एवं ऊखल की आकृति वाली भूमि त्याज्य होती है।।१६।। शङ्खाभं शङ्कुनाभं च बिडालकृकलासवत् । ऊषरं कृमिभिर्जुष्टं गृहगौलिसमाकृति ॥१७॥ शङ्ख, शङ्कु, विडाल, गिरगिट तथा छिपकली की आकृति वाली, ऊसर एवं कीड़े

तृतीयोऽध्यायः 卐 भूपरीक्षा ११ लगी भूमि गृह-निर्माण के लिये त्याज्य होती है।।१७।। अन्यदेवंविधं वस्तु निन्दितं वस्तुपाठकैः । बहुप्रवेशमार्गं च मार्गविद्धं च गर्हितम् ।।१८।। इसी प्रकार अन्य आकृति वाली भूमि, बहुत से प्रवेशमार्ग वाली एवं मार्ग से विद्ध भूमि विद्वानों द्वारा निन्दित है।।१८।। यत् कर्म विहितं मोहादेवम्भूते तु वस्तुनि । तन्महादोषहेतुः स्यात्सर्वथा तद्विवर्जयेत् ।।१९।। यदि अज्ञानतावश ऐसी भूमि पर गृह बन भी जाय तो इससे महान् दोष उत्पन्न होता है। अतः सभी प्रकार से ऐसी भूमि का परित्याग करना चाहिये।।१९।। ✺ सर्वोत्कृष्टा भूः ✺ श्वेतासृक्पीतकृष्णा हयगजनिनदा षड्रसा चैकवर्णा गोधान्याम्भोजगन्धोपलतुषरहितावाक्प्रतीच्युन्नता या। पूर्वोदग्वारिसारा वरसुरभिसमा शूलहीनास्थिवर्ज्या सा भूमिः सर्वयोग्या कणदररहिता सम्मताद्यैर्मुनीन्द्रैः ।।२०।। इति मयमते वास्तुशास्त्रे भूपरीक्षा नाम तृतीयोऽध्यायः श्वेत, रक्त, पीत एवं कृष्ण वर्ण वाली, अश्व एवं गज के निनाद से युक्त, मधुर आदि छः स्वादों वाली, एक वर्ण की, गो-धान्य एवं कमल के गन्ध से युक्त, पत्थर एवं भूसे से रहित, दक्षिण एवं पश्चिम में ऊँची, पूर्व एवं उत्तर में ढलान वाली, श्रेष्ठ सुरभि के सदृश, शूल एवं अस्थि से रहित, कणद ( धूल, बालू आदि ) रहित भूमि सभी के लिये अनुकूल होती है, ऐसा सभी श्रेष्ठ मुनियों का विचार है।।२०।। व्याख्यात्मक टिप्पणी भूमि के प्रकार ( श्लोक १-२० ) (क) शिल्परत्न पूर्वभाग, तृतीय अध्याय में भूमिपरिग्रह के प्रसङ्ग में चार प्रकार की भूमि—पूर्णा, सुपा ( सुपद्मा ), भद्रा एवं धूम्रा का उल्लेख प्राप्त होता है— पूर्णा सुपद्मा च तथैव भद्रा धूम्रा च भूमिर्विहिता चतुर्धा। वक्ष्ये च तासामपि लक्षणानि संक्षेपतो भूमिपरिग्रहार्थम्।। ( ३.४ )