भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28

अथ द्वितीयोऽध्यायः ( वस्तुप्रकारः ) ✹ वस्तुभेदाः ✹ अमर्त्याश्चैव मर्त्याश्च यत्र यत्र वसन्ति हि। तद् वस्त्विति मतं तज्ज्ञैस्तद्भेदं च वदाम्यहम् ॥१॥ आवास एवं भूमि के प्रकार—अमर ( देव ) एवं मरणधर्मा ( मनुष्य ) जहाँ- जहाँ निवास करते हैं, विद्वज्जन उसे वस्तु ( वास्तु ) कहते हैं। उन निवासस्थलों के भेदों का मैं ( मय ऋषि ) वर्णन करता हूँ॥१॥ भूमिप्रासादयानानि शयनं च चतुर्विधम्। भूरेव मुख्यवस्तु स्यात्तत्र जातानि यानि हि ॥२॥ वास्तु चार प्रकार के होते हैं—भूमि, प्रासाद ( देवालय ), यान एवं शयन। इनमें प्रधान वास्तु भूमि ही है; क्योंकि शेष इसी से उत्पन्न होते हैं॥२॥ प्रासादादीनि वास्तूनि वस्तुत्वाद् वस्तुसंश्रयात्। वस्तून्येव हि तान्येव प्रोक्तान्यस्मिन् पुरातनैः ॥३॥ प्रासाद आदि वास्तु प्रधान वस्तु ( वास्तु ) भूमि से उत्पन्न होने एवं उस पर आश्रित होने के कारण वास्तु ही हैं। इसी कारण प्राचीन आचार्यों ने इन्हें वास्तु की संज्ञा प्रदान की है॥३॥ वर्णगन्धरसाकारदिक्शब्दस्पर्शनैरपि । परीक्ष्यैव यथायोग्यं गृहीतावधिनिश्चिता ॥४॥ ( चारो वास्तुओं में प्रथमतः प्रधान वास्तु पर विचार करना चाहिये। ) भवन- प्रासादादि के निर्माण के लिये भूमि की परीक्षा वर्ण ( रंग ), गन्ध, रस ( स्वाद ), आकृति, दिशा, शब्द एवं स्पर्श के द्वारा करनी चाहिये। परीक्षा के पश्चात् ही निर्माण- कार्य की आवश्यकता के अनुसार भूमि-ग्रहण करना चाहिये॥४॥ ✹ भूमिभेदाः ✹ या सा भूमिरिति ख्याता वर्णानां च विशेषतः। द्विविधं तत् समुद्दिष्टं गौणमङ्गीत्यनुक्रमात् ॥५॥