मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः 卐 संग्रहाध्यायः ३ यानानां शयनानां च लक्षणं लिङ्गलक्षणम् । पीठस्य लक्षणं सम्यगनुकर्मविधिं तथा ॥१०॥ तदनन्तर यान के लक्षण, शयन के लक्षण, लिङ्ग ( देवलिङ्ग ) एवं उनके पीठ के लक्षण एवं उसके अनुरूप उचित कर्म की विधि वर्णित है।।१०।। प्रतिमालक्षणं देवदेवीनां मानलक्षणम्। चक्षुरुन्मीलनं चैव संक्षिप्याह यथाक्रमम् ॥११॥ देवालय के प्रसङ्ग में मूर्ति के लक्षण, देवता एवं देवियों के प्रमाण का लक्षण, नेत्रों के उन्मीलन की विधि क्रमानुसार संक्षेप में वर्णित है।।११।। ✵ ग्रन्थप्रामाण्यकथनम् ✵ पितामहाद्यैरमरैर्मुनीश्वरै- र्यथा यथोक्तं सकलं मयेन तत्। तथा तथोक्तं सुधियां दिवौकसां नृणां च युक्त्याखिलवस्तुलक्षणम् ॥१२॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे संग्रहाध्यायः प्रथमः ब्रंह्मा आदि देवों ने एवं श्रेष्ठ मुनियों ने जिस प्रकार विद्वानों, देवों एवं मनुष्यों के सम्पूर्ण भवनलक्षणों का उपदेश किया है, उसी प्रकार मय ऋषि ने उन सभी लक्षणों का वर्णन प्रस्तुत किया है।।१२।।