मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः 卐 वस्तुप्रकारः ७ व्याख्यात्मक टिप्पणी वास्तु के प्रकार ( श्लोक-१-३ ) वास्तु के अन्तर्गत जिन विषयों का अध्ययन अभिप्रेत है, उनका उल्लेख अन्य वास्तुग्रन्थों में भी प्राप्त होता है। उनमें से कुछ उल्लेखनीय प्रसङ्ग इस प्रकार हैं— (क) मानसार के अनुसार पृथिवी, भवन, यान एवं पर्यङ्क ( आसन ) वस्तु अथवा वास्तु हैं— तैतिलाश्र नराश्चैव यस्मिन्यस्मिन् परिस्थिताः। तद्वस्तु सूरिभिः प्रोक्तं तथा वै वक्ष्यतेऽधुना।। धराहर्म्यादि यानं च पर्यङ्कादि चतुर्विधम्। धरा प्रधानवस्तु स्यात्तत्तज्जातिषु सर्वशः।। ( ३.१-२ ) (ख) समराङ्गणसूत्रधार के अनुसार देश, पुर, निवास, सभा तथा वेश्मासन वास्तु के अन्तर्गत परिगणित हैं— देशः पुरं निवासश्च सभा वेश्मासनानि च। यद्यदीदृशमन्यच्च तत्तच्छ्रेयस्करं मतम्।। वास्तुशास्त्रादृते तस्य न स्याल्लक्षणनिश्चयः। तस्माल्लोकस्य कृपया शास्त्रमेतदुदीर्यते।। ( १.४-५ ) (ग) विश्वकर्मा के अनुसार देवों, मनुष्यों एवं गज आदि पशुओं की निवास-भूमि एवं भवन-निर्माण में प्रयुक्त इष्टका तथा शिला आदि वास्तु पद से अभिहित हैं— देवतानां नराणाञ्च गजगोवाजिनामपि। निवासभूमिशिल्पज्ञैर्वास्तुसंज्ञमितीर्यते ।।१।।
इष्टिका च शिला दारुरयःकीलादयोऽप्यमी। वास्तुकर्मणि चान्यत्र वास्तुसंज्ञमुदीरितम्।।६१।। ( विश्वकर्मवास्तुशास्त्र-७ ) इनके अतिरिक्त ( २.३२-४० ) वास्तु के शिल्पगत भेदों में ग्राम, पुरी, खेट, कर्वट, दुर्ग, प्रासाद, हर्म्य, न्यायशाला, सभा, कोशागार, अन्तःपुर, शस्त्रागार, क्रीडागृह, तोरण, मञ्चिक, अधिष्ठान, उपपीठ, गोपुर, सङ्कीर्णभवन, पताका, पारिभद्रक, चारों वर्णों के गृह, वेदिका, पोतिका, स्तम्भ, मण्डप, विमान एवं प्राकार आदि का वर्णन प्राप्त होता है।