भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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६ मयमतम् कषाय-मधुर स्वाद वाली भूमि ( ब्राह्मणों के लिये ) सुखद कही गयी है। क्षत्रियों के लिये श्रेष्ठ भूमि के लक्षण इस प्रकार हैं—भूमि लम्बाई में चौड़ाई से आठ भाग अधिक हो, मिट्टी का रंग लाल हो एवं स्वाद में तिक्त हो।। ११।। प्राङ्निम्नं तत् प्रविस्तीर्णमश्वत्थद्रुमसंयुतम्। प्रशस्तं भूभृतां वस्तु सर्वसम्पत्करं सदा ॥१२॥ पूर्व की ओर ढलान वाली, विस्तृत, पीपल के वृक्ष से समन्वित भूमि राजाओं ( क्षत्रियों ) के लिये शुभ एवं सर्वदा सभी प्रकार की सम्पत्ति प्रदान करने वाली कही गई है।। १२।। षडंशेनाधिकायामं पीतमम्लरसान्वितम्। प्लक्षद्रुमयुतं पूर्वावनतं शुभदं विशाम् ॥१३॥ लम्बाई चौड़ाई से छः भाग अधिक हो, मिट्टी का रंग पीला हो, उसका स्वाद खट्टा हो, प्लक्ष ( पाकड़ ) के वृक्ष से युक्त हो एवं पूर्व दिशा की ओर ढलान हो—ऐसी भूमि वैश्य वर्ण के लिये प्रशस्त कही गई है।।१३।। चतुरंशाधिकायामं वस्तु प्राक्प्रवणान्वितम्। कृष्णं तत् कटुकरसं न्यग्रोधद्रुमसंयुतम्। प्रशस्तं शूद्रजातीनां धनधान्यसमृद्धिदम् ॥१४॥ लम्बाई चौड़ाई से चार भाग अधिक हो, पूर्व दिशा की ओर ढलान हो, मिट्टी का रंग काला हो तथा स्वाद कड़वा हो, भूमि पर बरगद के वृक्ष हों। इस प्रकार की भूमि शूद्र वर्ण वालों को धन-धान्य एवं समृद्धि प्रदान करती है।।१४।। एवं प्रोक्तो वस्तुभेदो द्विजानां भूपानां वै वैश्यकानां परेषाम्। योग्यं सर्वं भूसुराणां सुराणां भूपानां तच्छेषयोरुक्तनीत्या ॥१५॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे वस्तुप्रकारो नाम द्वितीयोऽध्यायः इस प्रकार ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों एवं शूद्रों के अनुरूप वास्तु ( भूमि ) के प्रकार का वर्णन किया गया है। देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के लिये सभी प्रकार की भूमियाँ प्रशस्त होती हैं ( यह उपर्युक्त मत का विकल्प है ); किन्तु शेष दो ( वैश्य एवं शूद्र ) को अपने अनुरूप भूमि का ही चयन करना चाहिये।। १५।।