भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अथ तृतीयोऽध्यायः ( भूपरीक्षा ) ✺ अनिन्द्या भूः ✺ देवानां तु द्विजातीनां चतुरस्रायताः श्रुताः । वस्त्वाकृतिरनिन्द्या सावाक्प्रत्यग्दिक्समुन्नता ॥१॥ देवों एवं ब्राह्मणों के लिये आयताकार भूमि भी प्रशस्त होती है। भूमि की आकृति अनिन्दनीय होनी चाहिये एवं उसे दक्षिण तथा पश्चिम में ऊँची होनी चाहिये ।। १ ।। हयेभवेणुवीणाब्धिदुन्दुभिध्वनिसंयुता । पुन्नागजातिपुष्पाब्जधान्यपाटलगन्धकैः ॥२॥ भूमि अश्व, गज, वेणु, वीणा, समुद्र ( जल ) एवं दुन्दुभि वाद्य की ध्वनि से युक्त होनी चाहिये तथा पुन्नाग ( नागकेसर ), जाति-पुष्प ( चमेली ), कमल, धान्य एवं पाटल ( गुलाब ) के सुगन्ध से सुवासित होनी चाहिये ।। २ ।। पशुगन्धसमा श्रेष्ठा सर्वबीजप्ररोहिणी । एकवर्णा घना स्निग्धा सुखसंस्पर्शनान्विता ॥३॥ पशु के गन्ध के समान एवं जिस पर सभी प्रकार के बीज उगें, ऐसी भूमि श्रेष्ठ होती है। भूमि एक रंग की, सघन, कोमल एवं छूने में सुख प्रदान करने वाली होनी चाहिये ।। ३ ।। बिल्वो निम्बश्च निर्गुण्डी पिण्डितः सप्तपर्णकः । सहकारश्च षड्वृक्षैरारूढा या समस्थला ॥४॥ जिस समतल भूमि पर बेल, नीम, निर्गुण्डी, पिण्डित, सप्तपर्णक ( सप्तच्छद ) एवं सहकार ( आम )—ये छः वृक्ष हों एवं भूमि समतल हो ।।४।। श्वेता रक्ता च पीता च कृष्णा कापोतसन्निभा । तिक्ता च कटुका चैव कषायलवणाम्लका ॥५॥ रंग में श्वेत, लाल, पीली तथा कपोत के समान काली, स्वाद में तिक्त, कड़वी, कसैली, नमकीन, खट्टी—।।५।।