मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः 卐 भूपरीक्षा ११ लगी भूमि गृह-निर्माण के लिये त्याज्य होती है।।१७।। अन्यदेवंविधं वस्तु निन्दितं वस्तुपाठकैः । बहुप्रवेशमार्गं च मार्गविद्धं च गर्हितम् ।।१८।। इसी प्रकार अन्य आकृति वाली भूमि, बहुत से प्रवेशमार्ग वाली एवं मार्ग से विद्ध भूमि विद्वानों द्वारा निन्दित है।।१८।। यत् कर्म विहितं मोहादेवम्भूते तु वस्तुनि । तन्महादोषहेतुः स्यात्सर्वथा तद्विवर्जयेत् ।।१९।। यदि अज्ञानतावश ऐसी भूमि पर गृह बन भी जाय तो इससे महान् दोष उत्पन्न होता है। अतः सभी प्रकार से ऐसी भूमि का परित्याग करना चाहिये।।१९।। ✺ सर्वोत्कृष्टा भूः ✺ श्वेतासृक्पीतकृष्णा हयगजनिनदा षड्रसा चैकवर्णा गोधान्याम्भोजगन्धोपलतुषरहितावाक्प्रतीच्युन्नता या। पूर्वोदग्वारिसारा वरसुरभिसमा शूलहीनास्थिवर्ज्या सा भूमिः सर्वयोग्या कणदररहिता सम्मताद्यैर्मुनीन्द्रैः ।।२०।। इति मयमते वास्तुशास्त्रे भूपरीक्षा नाम तृतीयोऽध्यायः श्वेत, रक्त, पीत एवं कृष्ण वर्ण वाली, अश्व एवं गज के निनाद से युक्त, मधुर आदि छः स्वादों वाली, एक वर्ण की, गो-धान्य एवं कमल के गन्ध से युक्त, पत्थर एवं भूसे से रहित, दक्षिण एवं पश्चिम में ऊँची, पूर्व एवं उत्तर में ढलान वाली, श्रेष्ठ सुरभि के सदृश, शूल एवं अस्थि से रहित, कणद ( धूल, बालू आदि ) रहित भूमि सभी के लिये अनुकूल होती है, ऐसा सभी श्रेष्ठ मुनियों का विचार है।।२०।। व्याख्यात्मक टिप्पणी भूमि के प्रकार ( श्लोक १-२० ) (क) शिल्परत्न पूर्वभाग, तृतीय अध्याय में भूमिपरिग्रह के प्रसङ्ग में चार प्रकार की भूमि—पूर्णा, सुपा ( सुपद्मा ), भद्रा एवं धूम्रा का उल्लेख प्राप्त होता है— पूर्णा सुपद्मा च तथैव भद्रा धूम्रा च भूमिर्विहिता चतुर्धा। वक्ष्ये च तासामपि लक्षणानि संक्षेपतो भूमिपरिग्रहार्थम्।। ( ३.४ )