मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० मयमतम् देवालयसमीपस्था कण्टकिद्रुमसंयुता । वृत्तत्रिकोणविषमा वज्राभा कच्छपोन्नता ॥१२॥ देवालय के निकट, काँटेदार वृक्ष से युक्त, वृत्ताकार, त्रिकोण, विषम ( जिसकी आकृति असमान हो ), वज्र के सदृश ( कई कोण वाली ) तथा कछुये के समान आकृति ( बीच में ऊँची ) वाली भूमि गृहनिर्माण के लिये प्रशस्त नहीं होती है।।१२।। चण्डालावासगच्छाया चर्मकारालयाश्रिता । एकद्वित्रिचतुर्मार्गा तरिताव्यक्तमार्गका ॥१३॥ जिस भूमि पर चाण्डाल ( शव आदि से आजीविका चलाने वाले ) के गृह की छाया पड़े, चर्म द्वारा आजीविका चलाने वाले के गृह के पास, एक, दो, तीन एवं चार मार्गों पर ( एक-दो राजमार्गों, तिराहे एवं चौराहे ) पर स्थित तथा जहाँ ठीक मार्ग न हों, ऐसे स्थान पर गृह-निर्माण प्रशस्त नहीं होता।।१३।। निम्नं यत् पणवाकारं पक्षीव मुरजोपमम् । मत्स्याभं तु चतुष्कोणे महावृक्षसमायुतम् ॥१४॥ मध्य में दबी, पणव ( ढोल के सदृश एक वाद्य ), पक्षी, मुरज ( एक वाद्य ) तथा मछली के समान आकार की भूमि तथा जहाँ चारो कोनों पर महावृक्ष लगे हों, ऐसी भूमि गृहनिर्माण के लिये उचित नहीं होती है।।१४।। चैत्यवृक्षयुतं सालचतुष्कोणसमाश्रितम् । भुजङ्गनिलयं चैव सङ्गाराममेव च ॥१५॥ ग्रामादि के प्रधान वृक्ष, जिसके चारो कोनों पर साल वृक्ष हों, सर्प के आवास के निकट एवं मिश्रित जाति के वृक्षों के बाग के पास की भूमि गृह-निर्माण के लिये अप्रशस्त होती है।।१५।। श्मशानं चाश्रमस्थानं कपिसूकरसन्निभम् । वनोरगनिभं टङ्कं शूर्पोलूखलसन्निभम् ॥१६॥ श्मशान के क्षेत्र, आश्रमस्थान, बन्दर एवं सुअर के आकार की, वनसर्प के सदृश, कुठार की आकृति वाली, शूर्प एवं ऊखल की आकृति वाली भूमि त्याज्य होती है।।१६।। शङ्खाभं शङ्कुनाभं च बिडालकृकलासवत् । ऊषरं कृमिभिर्जुष्टं गृहगौलिसमाकृति ॥१७॥ शङ्ख, शङ्कु, विडाल, गिरगिट तथा छिपकली की आकृति वाली, ऊसर एवं कीड़े