भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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११६ मयमतम् चाहिये; किन्तु मञ्जूषा भवन के मध्य भाग में स्थापित हो तो उसका मुख बाहर की ओर होना चाहिये।।९७।। ✺ गर्भमन्त्रः ✺ इदं मन्त्रं समुच्चार्य प्राङ्मुखो वाऽप्युदङ्मुखः । पूर्वोक्तविधिना सम्यक् स्थापयेत् स्थपतिः क्रमात् ।।९८।। शिलान्यास का मन्त्र—मूलोक्त मन्त्र का उच्चारण करते हुये पूर्वाभिमुख अथवा उत्तरमुख होकर स्थपति को पूर्व-वर्णित विधि से क्रमशः विधिवत् भवन का गर्भ स्थापित करना चाहिये।।९८।। अयं मन्त्रः— स्वरदेवताभ्यो मन्त्रेभ्यः स्वाहा। सर्वरत्नाधिपतये स्वाहा। उत्तमप्रजापतये सत्यवादिने नमः। श्रियै नमः। सरस्वत्यै नमः। वैवस्वताय नमः। वज्रपाणये नमः। अभिनवसर्वविघ्नप्रशमनाय नमः। नमो वह्नये स्वाहा ॥ मन्त्र इस प्रकार है—मन्त्रों एवं स्वर के देवता के लिये स्वाहा। सभी रत्नों के अधिपति के लिये स्वाहा। उत्तम एवं सत्यवादी प्रजापति के लिये स्वाहा। लक्ष्मी को प्रणाम। सरस्वती को प्रणाम। विवस्वान् को प्रणाम। वज्रपाणि को प्रणाम। सभी विघ्नों के विनाशक अभिनव को प्रणाम। अग्नि को प्रणाम एवं स्वाहा। ✺ वाप्यादिगर्भः ✺ वापीकूपतटाके तु दीर्घिकासेतुबन्धने । मत्स्यमण्डूककुलिरं सर्पं वै शिंशुमारकम् ॥९९॥ हेमजं तदुदग्भागे पूर्वांयां दिशि वाथवा। पुरुषाञ्जलिमात्रे तु श्वभ्रे पात्रं निधापयेत् ।।१००।। बावड़ी आदि का शिलान्यास—वापी ( बावड़ी ), कूप, तालाब, दीर्घिका ( लम्बा सरोवर, जलाशय ) एवं पुल के निर्माण में गर्भ-स्थापन हेतु स्वर्ण-निर्मित मछली, मेढक, केकड़ा, सर्प एवं सूँस को पात्र में रखकर उत्तर दिशा या पूर्व दिशा में एक पुरुष की अञ्जली के माप के गड्ढे में स्थापित करना चाहिये।।९९-१००।। ✺ प्रथमेष्टका ✺ सुमुहूर्ते सुलग्ने च होराकरणसंयुते । रात्रौ गर्भमहन्त्येव स्थापयेच्चतुरिष्टकम् ॥१०१॥ शिलान्यास की प्रथम ईंट-स्थापना—भवन के गर्भ का स्थापन शुभ मुहूर्त,