मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 141, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः ११७ लग्न एवं होरा से युक्त रात्रि में करना चाहिये तथा शुभ मुहूर्त, लग्न एवं होरा से युक्त दिन में चार ईंटों की स्थापना करनी चाहिये।।१०१।। यद्यत् स्थानं तु गर्भस्य तत्रस्था प्रथमेष्टका । मृत्कन्दधान्यसल्लोहधातुरत्नौषधैः सह ।।१०२।। जिस-जिस स्थान पर गर्भ-स्थापन किया गया हो, वहाँ प्रथम ईंट मृत्तिका, जड़, अन्न, धातु, रत्न एवं ओषधियों के साथ स्थापित करनी चाहिये ।।१०२।। गन्धद्रव्यैश्च बीजैश्च विधेया प्रथमेष्टका । शैले शिलामयी प्रोक्ता चैष्टके चेष्टकाः शुभाः ।।१०३।। ( इनके अतिरिक्त ) गन्धयुक्त पदार्थों एवं बीजों के साथ प्रथम ईंट का न्यास करना चाहिये। प्रस्तर से निर्मित होने वाले भवन में प्रस्तरमयी शिला एवं ईंट से निर्मित होने वाले भवन में इष्टका का न्यास करना चाहिये ।।१०३।। गर्भभाजनविस्तारा विस्तारद्विगुणायता । विपुलार्धघना सर्वहर्म्यके चतुरिष्टका ।।१०४।। गर्भ में रखी जाने वाली मञ्जूषा के बराबर चौड़ी, चौड़ाई से दुगुनी लम्बी एवं चौड़ाई की आधी मोटी चारों इष्टकायें होनी चाहिये। इष्टका का यह प्रमाण सभी भवनों के लिये होता है ।।१०४।। अष्टौ द्वादश वा ग्राह्या मध्यमे तु महत्परे । ऋजुदीर्घाङ्गुलिन्यासा समसंख्या हि पुंस्त्वभाक् ।।१०५।। मध्यम एवं उससे बडे आकार के ईंट आठ या बारह होने चाहिये। पुरुष-इष्टकाओं की लम्बाई सीधी होनी चाहिये एवं उनका माप सम संख्या वाली अंगुलियों से रखना चाहिये ।।१०५।। स्त्रीत्वभागोजसंख्या सा वक्ररेखं नपुंसकम् । सुस्निग्धाः समदग्धाश्च सुस्वनास्ताः सुशोभनाः ।।१०६।। स्त्री-इष्टकाओं की लम्बाई का माप विषम संख्या में होना चाहिये तथा नपुंसक इष्टकाओं की रेखा वक्र होनी चाहिये। ईंटों को स्पर्श में चिकना, अच्छी प्रकार पका हुआ, ( ठोकने पर ) सुन्दर स्वर से युक्त एवं देखने में सुन्दर होना चाहिये ।।१०६।। पुंस्त्रीनपुंसके हर्म्ये योजयेत् ता यथाक्रमम् । यथा जाता पुरा तत्र स्थापनीया तथा भवेत् ।।१०७।। पुरुष, स्त्री एवं नपुंसक इष्टकाओं का भवन में प्रयोग क्रमानुसार करना चाहिये।