मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ त्रयोदशोऽध्यायः ( उपपीठविधानम् ) अधिष्ठानस्य चाधस्तादुपपीठं प्रयोजयेत् । रक्षार्थमुन्नतार्थं च शोभार्थं तत् प्रवक्ष्यते ॥१॥ उपपीठ-विन्यास—उपपीठ का निर्माण अधिष्ठान के नीचे होता है। यह भवन की रक्षा, ऊँचाई एवं शोभा के लिये होता है।।१।। समं त्रिपादमर्धं वा पञ्चांशद्द्व्यंशमेव वा । सपादं वाऽथ सार्धं वा पादोनद्विगुणं तु वा ॥२॥ उपपीठ का प्रमाण अधिष्ठान के बराबर ( ऊँचाई ), तीन चौथाई, आधा, पाँच भाग में से दो भाग के बराबर, सवा भाग, डेढ़ भाग अथवा दुगुने से चतुर्थांश कम होना चाहिये।।२।। द्विगुणं वा प्रकर्तव्यमात्ताधिष्ठानतुङ्गतः । उत्सेधे दशभागे तु एकेनैकेन वर्धनात् ॥३॥ अथवा उपपीठ को अधिष्ठान की ऊँचाई का दुगुना रखना चाहिये। ऊँचाई के दस भाग करने चाहिये तथा एक-एक भाग की वृद्धि करनी चाहिये।।३।। पञ्चांशान्तमधिष्ठानजन्माद् बाह्ये तु निर्गमम् । दण्डं वा सार्धदण्डं वा द्विदण्डं वा त्रिदण्डकम् ॥४॥ ( एक-एक भाग से वृद्धि करते हुये ) पाँचवें भाग तक निर्माण करना चाहिये। अथवा अधिष्ठान के प्रारम्भ से बाह्य भाग में ( अधिष्ठान से बाहर की ओर निकला हुआ ) एक दण्ड, डेढ़ दण्ड, दो दण्ड अथवा तीन दण्ड माप का निर्गम निर्मित करना चाहिये।।४।। अधिष्ठानजगत्या वा समं तत्पादबाह्यकम् । वेदिभद्रं प्रतिभद्रं सुभद्रं च त्रिधा मतम् ॥५॥ उपपीठ को अधिष्ठान अथवा जगती के बराबर भी निर्मित किया जाता है। उपपीठ तीन प्रकार के होते हैं—वेदिभद्र, प्रतिभद्र एवं सुभद्र।।५।।