भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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१२२ मयमतम् पादुकं पङ्कजं चैवमालिङ्गान्तरितं तथा। प्रत्यूर्ध्वं वाजनं कण्ठमुत्तराब्जकपोतकम् ॥१३॥ आलिङ्गान्तरितं चोर्ध्वे प्रतिश्चैवोर्ध्ववाजनम् । द्विविधं प्रतिभद्रं स्यादेकभागाधिकं ततः ॥१४॥ प्रतिभद्र दो प्रकार के होते हैं। (प्रथम प्रकार ऊपर वर्णित है।) दूसरे प्रकार में एक भाग अधिक होता है। (इसके अट्ठाईस भाग किये जाते हैं।) इसमें दो भाग से पादुक, तीन से पङ्कज, एक से आलिङ्ग, एक से अन्तरित, दो से प्रति, एक से ऊर्ध्व वाजन, आठ से कण्ठ, एक से उत्तर, एक से अब्ज, तीन से कपोत, एक से आलिङ्ग, एक से अन्तरित, दो से प्रति एवं एक भाग से ऊर्ध्ववाजन का निर्माण किया जाता है।।१२-१४।। ॐ सुभद्रम् ॐ त्रिःसप्तांशे तदुत्सेधे द्वाभ्यां जन्म तथाम्बुजम् । अर्धेन कण्ठमर्धेन पद्माद्व्यंशेन वाजनम् ॥१५॥ अर्धेनाब्जं तथा कम्पं कण्ठमष्टांशमीरितम् । अंशेनोत्तरमर्धेन पद्मं गोपानकं त्रिभिः ॥१६॥ भागार्धमूर्ध्वकम्पं स्यादेतन्नाम्ना सुभद्रकम् । इस उपपीठ में ऊँचाई के इक्कीस भाग किये जाते हैं। दो भाग से जन्म, दो से अम्बुज, आधे से कण्ठ, आधे से पद्म, दो से वाजन, आधे से अब्ज, आधे से कम्प, आठ से कण्ठ, एक से उत्तर, आधे से पद्म, तीन से गोपानक एवं आधे से ऊर्ध्व कम्प निर्मित होते हैं। (इनसे युक्त उपपीठ) की संज्ञा सुभद्रक होती है।।१५-१६।। जन्म द्व्यंशं त्र्यंशेन पद्ममंशेन कन्धरम् ॥१७॥ द्वाभ्यां वाजनमेकेन कम्पमष्टांशकैर्गलम् । अंशेन कम्पकं द्वाभ्यां वाजनं कम्पमंशकम् ॥१८॥ सुभद्रं द्विविधं प्रोक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम् । (सुभद्र उपपीठ का दूसरा भेद इस प्रकार है। इसमें भी ऊँचाई के इक्कीस भाग किये जाते हैं।) इसमें दो भाग से जन्म, तीन से पद्म, एक से कन्धर, दो से वाजन, एक से कम्प, आठ से गल, एक से कम्प, दो से वाजन एवं एक से कम्प निर्मित होता है। इस प्रकार सभी (उपर्युक्त) अलङ्करणों से युक्त सुभद्र उपपीठ दो प्रकार के होते हैं।।१७-१८।।